दिल्ली-श्रीनगर फ्लाइट को टर्बुलेंस से नुकसान: ये होता क्यों है, कितना खतरनाक; सुरक्षित बचने का तरीका क्या?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 22 May 2025 03:04 PM IST
सार
टर्बुलेंस होता क्या है? विमान को इस स्थिति में किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है? टर्बुलेंस कब खतरनाक हो सकता है? इससे सुरक्षा के लिए क्या तरीके आजमाए जा सकते हैं? एयरलाइन इनसे बचाव के लिए क्या तरीके आजमा सकती हैं? इसके अलावा टर्बुलेंस से प्रभावित लोगों को किस तरह की समस्याएं आ सकती हैं? आइये जानते हैं...
नई दिल्ली से श्रीनगर जाने वाली इंडिगो फ्लाइट बुधवार को खराब मौसम के चलते भीषण टर्बुलेंस का शिकार हो गई। आलम यह रहा कि तेज हवा में हिचकोले खाने के बाद विमान की नोज यानी आगे का हिस्सा तक क्षतिग्रस्त हो गया। हालांकि, पायलट की सूझबूझ ने किसी अनहोनी की आशंका को टाल दिया और विमान की श्रीनगर हवाई अड्डे पर सुरक्षित आपात लैंडिंग हुई। बताया गया है कि विमान में 220 से ज्यादा यात्री सवार थे। इनमें तृणमूल कांग्रेस की नेता सगारिका घोष भी शामिल थीं।
भारतीय हवाईअड्डा प्राधिकरण के एक अधिकारी ने बताया कि इंडिगो की उड़ान संख्या 6ई2142 को ओलावृष्टि के कारण टर्बुलेंस का सामना करना पड़ा। टर्बुलेंस का मतलब हलचल से है। इस स्थिति में उड़ान हिचकोले खाने लगती है और ऐसे में कई बार विमान तेज हवा में उड़ने से अपनी ऊंचाई भी खो देता है।
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विमान में टर्बुलेंस।
- फोटो : प्रतीकात्मक
नई दिल्ली से श्रीनगर जाने वाली इंडिगो फ्लाइट बुधवार को खराब मौसम के चलते भीषण टर्बुलेंस का शिकार हो गई। आलम यह रहा कि तेज हवा में हिचकोले खाने के बाद विमान की नोज यानी आगे का हिस्सा तक क्षतिग्रस्त हो गया। हालांकि, पायलट की सूझबूझ ने किसी अनहोनी की आशंका को टाल दिया और विमान की श्रीनगर हवाई अड्डे पर सुरक्षित आपात लैंडिंग हुई। बताया गया है कि विमान में 220 से ज्यादा यात्री सवार थे। इनमें तृणमूल कांग्रेस की नेता सगारिका घोष भी शामिल थीं।
भारतीय हवाईअड्डा प्राधिकरण के एक अधिकारी ने बताया कि इंडिगो की उड़ान संख्या 6ई2142 को ओलावृष्टि के कारण टर्बुलेंस का सामना करना पड़ा। टर्बुलेंस का मतलब हलचल से है। इस स्थिति में उड़ान हिचकोले खाने लगती है और ऐसे में कई बार विमान तेज हवा में उड़ने से अपनी ऊंचाई भी खो देता है।
इस घटना में फिलहाल किसी के हताहत होने की खबर नहीं है। हालांकि, इंडिगो ने अपने बयान में साफ किया कि फ्लाइट के लैंड होने के बाद प्रोटोकॉल के तहत सभी यात्रियों की सुरक्षा और आराम का विशेष ध्यान रखा गया।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ये टर्बुलेंस होता क्या है? विमान को इस स्थिति में किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है? टर्बुलेंस कब खतरनाक हो सकता है? इससे सुरक्षा के लिए क्या तरीके आजमाए जा सकते हैं? एयरलाइन इनसे बचाव के लिए क्या तरीके आजमा सकती हैं? इसके अलावा टर्बुलेंस से प्रभावित लोगों को किस तरह की समस्याएं आ सकती हैं? आइये जानते हैं...
कितनी तरह के होते हैं टर्बुलेंस, इनसे कितना खतरा?
विमानों को जिन सात तरह के टर्बुलेंस का आमतौर पर सामना करना पड़ता है, उनमें कुछ तो इतने आम हैं कि विमान के उड़ान भरने और इसके उतरने के दौरान ही यात्रियों को असहज महसूस होता है। हालांकि, कुछ टर्बुलेंस बीच फ्लाइट में भी विमान को प्रभावित करते हैं। इनमें चार मुख्य होते हैं...
1. विंड शीयर
इस तरह का टर्बुलेंस तब होता है, जब हवा की गति में अचानक बदलाव हो जाता है। फिर चाहे यह विमान के उड़ान भरने वाली दिशा में हो (वर्टिकल) या उसकी क्षैतिज या आड़ी दिशा में (हॉरिजॉन्टल)। आमतौर पर इस तरह के टर्बुलेंस से विमान के पीछे का हल्का हिस्सा दिशा बदलने लगता है और पायलट को इसे संभालने में खासी दिक्कतें आती हैं।
2. फ्रंटल या विमान के सामने से आने वाला टर्बुलेंस
इस तरह के टर्बुलेंस की वजह विमान के सामने मौजूद गर्म हवा हो सकती है। इससे उड़ान भर रही फ्लाइट को उच्च दाब वाली हवा को भेदना होता है, जो कि विमान में थरथराहट पैदा कर सकता है। यह गर्म हवा अगर थोड़ी सी नम होती है तो स्थिति और मुश्किल हो सकती हैं।
3. पहाड़ों की वजह से होने वाला टर्बुलेंस
इस तरह के टर्बुलेंस का सामना विमानों को तब करना पड़ता है, जब सामने या आसपास कोई लंबी ठोस वस्तु आ जाए। मसलन पहाड़ या ऊंची इमारतें। यह ढांचे सामान्य हवाओं में व्यवधान पैदा करते हैं और विमान उन जगहों पर टर्बुलेंस का शिकार होता है, जहां ऐसे ढांचे हर कुछ दूरी पर स्थित होते हैं।
4. हवाओं के द्रव्यमान बदलने से होने वाला टर्बुलेंस
जब भी कोई विमान आसमान में आगे बढ़ता है तो उसे अलग-अलग तरह की हवाओं का सामना करना पड़ता है। कभी कम द्रव्यमान वाली हवाओं का तो कभी ज्यादा द्रव्यमान वाली हवाओं का। अगर फ्लाइट अलग-अलग द्रव्यमान और दिशाओं वाली हवाओं से होकर गुजर रहा है, तो उसे भारी टर्बुलेंस का सामना करना पड़ता है। इस तरह के टर्बुलेंस तेज हवाओं या उस क्षेत्र से पहले गुजरे विमान के कारण हवाओं के मापदंड बदलने से हो सकते हैं।
तो क्या टर्बुलेंस हमेशा खतरनाक होते हैं?
किसी विमान के टर्बुलेंस झेलने की घटना आम होती है और पायलटों को इन स्थितियों से निपटने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है। हालांकि, कई बार तेज हवाओं या खराब मौसम के कारण तेज हवाएं विमानों के लिए मुश्किल पैदा कर सकती हैं। दिल्ली-श्रीनगर फ्लाइट को 21 मई (बुधवार) को भी मौसम बदलने की वजह से तेज हवाओं का सामना करना पड़ा, जिसकी वजह से इसके आगे का हिस्सा तक क्षतिग्रस्त हो गया। हालांकि, पायलट की बेहतर ट्रेनिंग की वजह से विमान सही-सलामत एयरपोर्ट पर लैंड हो गया।
एयरलाइन कैसे कर सकती हैं टर्बुलेंस से निपटने के उपाय?
एफएए के मुताबिक, एयरलाइन कंपनियां उड़ानों को रवाना करने के तरीकों को बेहतर कर सकती हैं। खासकर अपने संचार माध्यमों को हर वक्त खुला रखकर।
इसके अलावा विमानन कंपनियां मौसम विभाग की ब्रीफिंग को भी समय-समय पर अपडेट कर सकती हैं, जिससे मौसम संबंधी टर्बुलेंस से बचा जा सके।
पायलट और डिस्पैचर के बीच लगातार जानकारी का आदान-प्रदान भी अनिवार्य होना चाहिए, ताकि रियल टाइम जानकारी के हिसाब से ही तैयारियां की जा सकें।
एयरलाइन कंपनियां वातावरण की मॉडलिंग और डाटा संग्रहण जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भी कर सकती हैं, जिससे क्षेत्र में हो रहे बदलावों को भी ट्रैक किया जा सकेगा।
तो क्या टर्बुलेंस से जुड़ी घटनाओं से खास समस्याएं भी हो सकती हैं?
दिल्ली-श्रीनगर फ्लाइट में हुए टर्बुलेंस से भले ही यात्री हताहत नहीं हुए, लेकिन पैसेंजर्स की सुरक्षा के लिए विमानन कंपनी ने तुरंत अपने स्टाफ को उनकी देखरेख के लिए भेजा। एक यात्री ने कहा कि लैंडिंग से करीब 20-30 मिनट पहले सीट बेल्ट बांधने का एलान हुआ और फिर जोरदार झटके लगे। ऐसा लगा कि ये हमारी आखिरी फ्लाइट है।
वहीं, इस फ्लाइट में टीएमसी सांसद सागारिका घोष भी थीं। उनके साथ प्रतिनिधिमंडल में डेरेक ओ ब्रायन, नदिमुल हक समेत कुछ और नेता भी थे। घोष ने इस खतरनाक हवाई अनुभव को मौत जैसा अनुभव बताया। उन्होंने कहा कि ऐसा लगा कि जिंदगी अब खत्म हो जाएगी। लोग चिल्ला रहे थे, प्रार्थना कर रहे थे और घबरा गए थे।
विमान में सवार शेख समीउल्लाह (सीईओ फास्टबीटल) ने अमर उजाला को फोन पर बताया कि जब हम टर्बुलेंस जैसे खतरनाक अनुभव के बाद आखिरकार उतरे और विमान के आगे के हिस्से को क्षतिग्रस्त देखा तो सदमा और गहरा गया। यह एक भयावह अनुभव था। जिसे हम कभी नहीं भूलेंगे। उतरने पर हमें अंदर ले जाया गया।
मानसिक समस्या में बदल सकती हैं इस तरह की घटनाओं का अनुभव
एक्सपर्ट्स का मानना है कि कुछ यात्रियों में ऐसी फ्लाइट्स के अनुभव के बाद कुछ डर भी पैदा हो जाता है। जैसा कि टीएमसी सांसद और एक अन्य यात्री ने अपने अनुभवों को मौत के करीब का अनुभव करार दिया। ऐसी घटनाओं के बाद यात्रियों में आमतौर पर पीटीएसडी यानी पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर जैसी समस्याएं देखी जा सकती हैं।
पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर क्या है?
मनोचिकित्सक डॉक्टर सत्यकांत त्रिवेदी के मुताबिक, इस तरह टर्बुलेंस की घटनाएं लोगों के दिमाग में गहरी छाप छोड़ती हैं। लोगों के दिमाग में जो फीयर सेंटर यानी जो केंद्र डर पैदा करते हैं, वह हाइपरएक्टिव (जरूरत से ज्यादा सक्रिय) हो सकते हैं। इस स्थिति में यात्री बिना किसी खतरे के भी पहले की तरह खतरे महसूस कर सकते हैं। यही पोस्ट ट्रॉमेटिक डिसऑर्डर बन जाता है। धीरे-धीरे यह स्थिति फोबिया बन सकती है। पीटीएसडी का अगर समय पर निदान और उपचार न हो पाए तो इसके कारण दीर्घकालिक रूप से स्वास्थ्य जोखिम हो सकते हैं।
कैसे होते हैं पीटीएसडी के लक्षण?
पीटीएसडी की समस्या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। इसके कारण चिंता-तनाव और अवसाद जैसे विकारों का खतरा बढ़ जाता है। कुछ लक्षणों पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना और उपचार प्राप्त करना आवश्यक है।
पीटीएसडी के दौरान बुरे सपने और दर्दनाक घटना के फ्लैशबैक, जिसके बाद बदन में कंपन और चिंता बढ़ सकती है।
लोगों, स्थानों, गतिविधियों और स्थितियों से दूर भागना जो दर्दनाक घटना की याद दिलाते हों।
क्या हुआ या आप इसके बारे में कैसा महसूस करते हैं, इस बारे में बात करने से बचना।
अनजान लोगों से मिलने से डर लगना।
पीटीएसडी को कैसे ठीक किया जाता है?
जिन लोगों में पीटीएसडी का निदान किया जाता है, उन्हें मनोचिकित्सा (टॉक थेरेपी) की जरूरत होती है। विशेष रूप से कॉग्नेटिव बिहेवियरल थेरेपी की मदद से लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। थेरेपी की मदद से पीटीएसडी के कारण होने वाली मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम किया जा सकता है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।