आईआईटी बॉम्बे और टाटा मेमोरियल के शोधकर्ताओं ने कार टी-सेल थेरेपी विकसित की है, जो ल्यूकोमिया, लिम्फोमा, गैस्ट्रिक और ब्रेन ट्यूमर के इलाज में कारगर साबित हुई है। मरीज की अपनी टी-कोशिकाओं को संशोधित कर बनाई गई इस थेरेपी से 100 में से 73 मरीजों को लाभ मिला।
कार टी-सेल (कोशिका) थेरेपी गैस्ट्रिक और ब्रेन ट्यूमर के इलाज में खासी कारगर साबित हुई है। कई शोध अध्ययनों में इस थेरेपी के बेहद असरदार होने के सुबूत सामने आए हैं। मार्च में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बॉम्बे और टाटा मेमोरियल अस्पताल, मुंबई के शोधकर्ताओं का ये शोधपत्र अमेरिकन सोसायटी ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी 2025 की सालाना बैठक में पेश किया गया।
कैंसर के इस खास इलाज या कार टी-सेल थेरेपी को शोधकर्ताओं ने मरीज की खुद की रोग प्रतिरोधक कोशिकाओं इस्तेमाल कर तैयार किया है। दरअसल, इस थेरेपी में कैंसर के मरीज के इलाज के लिए उसकी टी-कोशिका के जीन में बदलाव किया जाता है, ताकि वे कैंसर से लड़ सकें। रक्त कैंसर जैसे ल्यूकोमिया और लिम्फोमा के मरीजों पर आजमाया गया और यह बेहद कारगर रहा। करीब 100 में से 73 मरीजों को फायदा हुआ।
इलाज व असर के लिए दो चरणोंं में होता है परीक्षण
जब कोई नई दवा बनाई जाती है, तो उसे कई चरणों में आजमाया जाता है। पहला चरण किसी भी नई दवा की इंसानों पर की जाने वाली पहली जांच होती है। यह देखता है कि नई दवा इंसानों के लिए सुरक्षित है या नहीं और कितनी मात्रा यानी खुराक देनी चाहिए। इसे आमतौर पर 20 से 100 स्वस्थ लोगों पर आजमाया जाता है। दूसरे चरण में यह पता किया जाता है कि दवा असल में असरदार है या नहीं इसका कोई दुष्प्रभाव तो नहीं। इसमें दवा को 100 से 300 मरीजों पर आजमाया जाता है।