देश के 49.5% भारतीय युवा अब भी अपनी कठिन भावनाओं को छिपाते हैं और उनसे पूरी तरह खुद ही निपटने की कोशिश करते हैं, जबकि केवल 9.2% ने प्रोफेशनल की मदद ली है। मदद मांगने की यह झिझक इस बात में भी दिखती है कि युवा अपनी परेशानी को ज्यादातर छिपाने की कोशिश करते हैं।
एम्पॉवर नए सर्वे के मुताबिक, मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बावजूद देश के युवा अब भी भावनात्मक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। "अनपैक योर इमोशनल बैगेज : ए कॉल टू एक्शन फॉर यंग इंडियंस टू सीक हेल्प ड्यूरिंग इमोशनल डिस्ट्रेस" शीर्षक वाले इस सर्वे में भारत के दस प्रमुख क्षेत्रों (मुंबई, पुणे, दिल्ली एनसीआर, बेंगलुरु, कोलकाता, अहमदाबाद, गोवा, हैदराबाद, चेन्नई और जयपुर) के 18 से 25 वर्ष की आयु के युवाओं के जवाब शामिल किए गए हैं। यह अध्ययन युवाओं में भावनात्मक तनाव की वजहों, इससे निपटने के तरीकों और परेशानी के समय दूसरों की प्रतिक्रियाओं की पड़ताल करता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर सार्वजनिक चर्चाएं बढ़ी हैं, लेकिन 40.9% लोगों ने कहा कि ठीक न होने पर भी वे दूसरों से "मैं ठीक हूं" कहते हैं। कई लोग अपनी भावनाओं पर बात करने से पूरी तरह बचते हैं, तो कई खुद को लगातार व्यस्त रखते हैं ताकि उस बारे में सोचना न पड़े। सर्वे यह भी बताता है कि जब युवा मन की बात कहते हैं, तो अक्सर उनकी भावनाओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है। वहीं, केवल 13.6% ने बताया कि किसी ने बिना जज किए उनकी बात सुनी और उनका साथ दिया। एजेंसी
मानसिक स्वास्थ्य हमारे जीने का तरीका एम्पॉवर के चीफ मेडिकल एडवाइजर डॉ. ज़ीरक मार्कर ने कहा, "मानसिक स्वास्थ्य केवल डिप्रेशन या एंग्जायटी जैसी बीमारी का नाम नहीं है। यह हमारे जीने का तरीका है, यानी हम अपने विचारों को कैसे संभालते हैं, रिश्तों को कैसे निभाते हैं और अपने दुख से कैसे बाहर निकलते हैं। जब युवाओं से बार-बार 'मजबूत बनो', 'काम पर ध्यान दो' या 'ज्यादा मत सोचो' जैसी बातें कही जाती हैं, तो उनके दर्द को अनदेखा कर दिया जाता है।