1945 के फरवरी महीने में एयर मार्शल सिंह कोर्ट मार्शल से बाल-बाल बचे थे। उन्होंने उस दौरान एक ट्रेनी पायलट का हौसला बढ़ाने के लिए केरल के एक घर से बहुत कम ऊंचाई पर उड़ान भरी थी। कहा जाता है कि वह ट्रेनी पायलट दिलबाग सिंह थे जो बाद में वायुसेना के प्रमुख बने। जब अर्जन सिंह से इस बारे में कैफियत मांगी गई तो उन्होंने कहा कि ऐसी नीची उड़ानें फाइटर पायलट बनने की ट्रेनिंग के लिए जरूरी हैं।
1965 के युद्ध में अहम भूमिका
अर्जन सिंह 1 अगस्त 1964 से 15 जुलाई 1969 तक वायुसेना प्रमुख रहे। 1965 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 1965 के युद्ध में बेहद अहम भूमिका निभाने की वजह से वह भारत के पहले ऐसे एयर चीफ मार्शल बने, जिन्हें चीफ ऑफ एयर स्टाफ से सीधे एयर चीफ मार्शल बना दिया गया था।
कई देशों में रहे राजदूत
1970 में 50 वर्ष की उम्र में उन्होंने सेना से रिटायरमेंट ले लिया। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने स्विटजरलैंड में भारत का राजदूत बनाया गया। साथ ही साथ वह वेटिकन के लिए भारतीय राजदूत के तौैर पर काम करते रहे। 1974 में उन्हें केन्या का राजदूत नियुक्त किया गया। 1975 से 1981 के बीच वह राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य भी रहे। इसके बाद दिसंबर 1989 से दिसंबर 1990 तक दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर भी रहे। सेना में उनके जबरदस्त योगदान के देखते हुए उन्हें 2002 में एयर फोर्स मार्शल का ओहदा दिया गया।