भले ही रेल मंत्री सुरेश प्रभु रेल सेवा में व्यापक सुधार व बदलाव की बात करते हों, लेकिन सुप्रीम कोर्ट इससे कतई भी सहमत नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय रेल देश की आजादी से पहले ज्यादा बेहतर स्थिति में थी। साथ ही शीर्ष अदालत ने रेल मंत्रालय को ठोस व कारगर कदम उठाने के लिए कहा है।
न्यायमूर्ति एसए बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की पीठ ने भारतीय रेल की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए कहा कि आजादी से पहले रेलवे की स्थिति बेहतर थी। पीठ ने कहा कि आखिर रेलवे की गुणवत्ता सुधारने के लिए क्यों नहीं कारगर कदम नहीं उठाए जा रहा हैं? पीठ ने रेलवे की ओर से पेश वकील से यह जानना चाहा कि आखिर क्यों नहीं रेलवे में सुधार हो रहा है।
साथ ही यह भी पूछा कि आखिर रेलवे में क्या सुधार हुए हैं? जवाब में वकील ने कहा कि रेलवे में स्वच्छता को बेहतर बनाया गया है। इसके अलावा कई अन्य चीजों में सुधार हुआ है। जिस पर पीठ ने कहा कि हम ऐशो-आराम की बात नहीं कर रहे हैं। हम जानना चाहते है कि आखिर रेलवे की मूलभूत सुविधाओं और सुरक्षा को लेकर क्या कदम उठाए गए? पीठ ने वकील से यह भी पूछा कि क्या आप रेल से यात्रा करते हैं। आपको पता है रेल की क्या हालत है?
रेलवे के वकील ने कहा याचिकाकर्ता वकील अभय सिंह की कुछ और नए तथ्य सामने लाए गए हैं, जिस पर जवाब दाखिल करने के लिए उन्हें चार हफ्ते का वक्त दिया जाए। जिसके बाद पीठ ने सुनवाई चार हफ्ते के लिए टालते हुए रेलवे को इस दिशा में कुछ करने के लिए कहा।
याचिका में ट्रेन के कोच में घटिया सामग्री के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया है। याचिका में कहा गया है कि कोच में इस्तेमाल होने वाले फोम, लकड़ी, कल पुर्जे आदि उच्च स्तरीय नहीं हैं। जिस कारण दुर्घटनाएं अधिक हो रही हैं। कोच में आगजनी की घटनाएं हो रही हैं।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि घटिया सामग्री होने से कोच में आग लगने पर स्थिति भयावह हो जाती है। इनसे जहरीली गैसें निकलती हैं जिससे कई लोगों की मोत हो जाती है। पिछले कुछ सालों में ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं। अदालत ने इन सामग्रियों का लैब टेस्ट कराने का आदेश दिया था। टेस्ट में पाया गया है कि पीवीसी फ्लोरिंग, बर्थ में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों से जहरीली गैसें निकलती हैं।