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Navy Drone: युद्धपोत से 1000 किमी दूर दुश्मन पर वार करेंगे नौसेना के ड्रोन; मौका मिलते ही शत्रु पर टूट पड़ेगा

सार

भारतीय नौसेना युद्धपोतों से लंबी दूरी तक निगरानी और सटीक हमले के लिए मीडियम रेंज लॉइटरिंग म्यूनिशन हासिल करने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित ड्रोन करीब 1000 किलोमीटर दूर तक लक्ष्य पर कार्रवाई कर सकेंगे और नौ घंटे तक क्षेत्र में मंडरा सकेंगे। क्या एक जहाज से छोड़ा ड्रोन दूसरे जहाज से नियंत्रित होगा? क्या यह बिना सैटेलाइट सिग्नल भी काम करेगा? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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समुद्र से दुश्मन के इलाके तक सीधी नजर - फोटो : Amar Ujala Graphics
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विस्तार
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नौसेना जल्द ही ऐसे आत्मघाती ड्रोन शामिल करने की तैयारी में है जो किसी युद्धपोत से उड़ कर 1,000 किलोमीटर दूर स्थित लक्ष्य को भी तबाह कर सकें। रक्षा मंत्रालय ने 9 घंटे तक लक्ष्य क्षेत्र पर मंडराकर उसकी पहचान करने की क्षमता वाले मीडियम रेंज लॉइटरिंग म्यूनिशन (मंडराने वाले ड्रोन) के लिए सूचना अनुरोध जारी किया है। इससे युद्धपोतों से लंबी दूरी तक निगरानी कर सटीक हमला करने की नौसेना की क्षमता में इजाफा होगा। यह ड्रोन समुद्र में दुश्मन के युद्धपोतों के साथ-साथ जमीन पर मौजूद लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम होंगे।

ड्रोन की खासियत

इस ड्रोन की गति कम से कम 139 किमी प्रति घंटा और लक्ष्य पर हमला करते समय कम से कम 370 किमी प्रति घंटा होगी। यह अधिकतम 15 हजार फुट की ऊंचाई तक उड़ सकेगा और लक्ष्य पर एक मीटर से भी कम की सटीकता से प्रहार करने में सक्षम होगा। लक्ष्य का अपने आप पीछा करने की क्षमता भी होगी। रडार पर इसकी पहचान को भी सीमित रखने की तकनीकी व्यवस्था भी होगी। यह ड्रोन 93 किलोमीटर प्रति घंटे तक की हवा में भी काम करने में सक्षम होगा। साथ ही माइनस 20 से 60 डिग्री सेल्सियस के तापमान और 95 प्रतिशत आर्द्रता में काम कर सकेगा। इसमें दिन और रात दोनों में लक्ष्य देखने के लिए कैमरा और अवरक्त सेंसर होंगे। सेंसर लक्ष्य का अपने आप पीछा भी कर सकेगा।

एक जहाज से छोड़ा, दूसरे से नियंत्रण

इस ड्रोन की अहम विशेषता यह होगी कि इसे केवल उस युद्धपोत से ही नियंत्रित करना जरूरी नहीं होगा, जिससे इसे छोड़ा गया है। नौसेना चाहती है कि उड़ान के दौरान इसका नियंत्रण एक युद्धपोत से दूसरे युद्धपोत को हस्तांतरित किया जा सके। यानी एक जहाज इसे छोड़ सकता है और दूसरा जहाज इसके उड़ान मार्ग, निगरानी और हमले से जुड़े संचालन को संभाल सकता है। इसके लिए रेडियो और उपग्रह आधारित संचार व्यवस्था होगी। युद्धपोत से हथियार को निर्देश भेजे जा सकेंगे और उससे तस्वीरें तथा वीडियो भी प्राप्त किए जा सकेंगे।

उपग्रह नेविगेशन बंद होने पर भी काम

नौसेना ने इसे युद्ध के ऐसे वातावरण के लिए तैयार करने की जरूरत जताई है, जहां दुश्मन उपग्रह आधारित दिशा-निर्धारण प्रणाली को बाधित कर सकता है। इसलिए हथियार में उपग्रह संकेत उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में भी काम करने की क्षमता होगी। संचार टूटने की स्थिति में भी ड्रोन अपने आप कार्रवाई करने में सक्षम होगा। संपर्क टूटने पर यह नियंत्रण केंद्र की ओर लौट सकेगा। यदि संपर्क बहाल न हो तो पहले से तय किए गए स्थान की ओर जा सकेगा। एक अकेला ऑपरेटर एक साथ 10 लॉइटरिंग म्यूनिशन नियंत्रित कर सकेगा। नौसेना ने एक साथ कई ड्रोन्स को स्वार्म रूप में संचालित करने की क्षमता की जानकारी भी मांगी है। 

समुद्री वातावरण के अनुकूल

इस ड्रोन में युद्धपोत के घने विद्युत-चुंबकीय वातावरण में भी काम करने की क्षमता होगी। इसके लिए राडार, संचार और अन्य इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के कारण पैदा होने वाले हस्तक्षेप से बचाव की क्षमता होगी। नौसेना ऐसा ड्रोन चाहती है, जिसमें भविष्य में नए सेंसर और दूसरी तकनीकें जोड़ी जा सकें। इसका ढांचा ऐसा होगा कि समय के साथ सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर उन्नत किए जा सकेंगे।

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