साल 2003 से 2008 तक देश भर में दर्जनों जगह इंडियन मुजाहिदीन ने बम धमाके करवाए थे। धमाकों से जुड़े इन सभी केसों में काफी आरोपी गिरफ्तार हुए, लेकिन धमाकों के सरगना जिस रियाज और इकबाल भटकल ने अपने आतंकवादी संगठन को इंडियन मुजाहिदीन नाम दिया था, वो दोनों बाद में नेपाल के रास्ते पाकिस्तान भाग गए थे।
किताब में राजेश पांडेय ने लिखा है कि सीबीआई की एक टीम ने इंडोनेशिया जाकर छह नवंबर 2015 को छोटा राजन को अपनी कस्टडी में ले लिया और भारत लेकर आई। इसके बाद से वो तिहाड़ जेल में बंद है। जब छोटा राजन गिरफ्तार नहीं हुआ था, तब उसने भी दावा किया था कि रियाज भटकल का मर्डर पाकिस्तान में उसके लोगों ने करवाया था। किताब में राजेश पांडेय लिखते हैं कि 1993 के बम ब्लास्ट के बाद अंडरवर्ल्ड हिंदू-मुस्लिम को आधार बनाकर जो दो फाड़ हुआ था, अब वो नदी के दो किनारे हो चुके हैं।
दाऊद पाकिस्तान में पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई के कब्जे में था और उसके विरोधी हिंदू गुट के छोटा राजन, सुभाष ठाकुर, बबलू श्रीवास्तव, पीपी पाण्डेय उर्फ बंटी पांडे भारतीय जेलों में थे। पुराने मुकदमों में इन सभी को सजा हो गई। सभी आज भी आजीवन कारावास काट रहे हैं। राजेश पांडेय के मुताबिक, छोटा राजन की गिरफ्तारी यानी 2015 के बाद मुंबई पूरी तरह से अंडरवर्ल्ड के दबाव से मुक्त हो चुकी थी। दोनों पक्षों के शूटर या तो मारे गए या फिर जेलों में हैं।
पूर्व आईपीएस अधिकारी के अनुसार, साल 2015 में छोटा राजन के तिहाड़ में आते ही इन सभी का जेलों में रहते हुए परस्पर संपर्क हुआ। बाकी लोगों ने बबलू श्रीवास्तव को इस बात के लिए बधाई दी कि उसने अकेले अपने दम पर नेपाल में दाऊद का पूरा नेटवर्क खत्म कर दिया। (ऐसा कहा जाता है कि दाउद से कथित तौर पर जुड़े रहे नेपाली सांसद मिर्जा दिलशाद बेग की हत्या की साजिश में भी बबलू श्रीवास्तव का हाथ था)।
राजेश पांडेय के मुताबिक, बबलू श्रीवास्तव ने आगे कहा, अभी भी मौलाना मसूद अजहर, सैयद सलाहुद्दीन, तलहा हाफिज सईद, जकी उर रहमान लखवी, अमीर सरफराज तांबा जिसने सरबजीत सिंह की हत्या की थी, सब अपना नेटवर्क पाकिस्तान में बैठकर चला रहे हैं। ये सभी कभी-न-कभी दाऊद के कृपापात्र रहे हैं। बबलू ने आगे बताया, 'जब तक दाऊद खत्म नहीं होता, हमारा बदला पूरा नहीं होगा, क्योंकि वो देश के खिलाफ काम करता रहा है और आईएसआई के इशारे पर देश को बहुत नुकसान पहुंचा चुका है। इसलिए हम सभी को एक होकर भारतीय एजेसियों की मदद करनी होगी।'
किताब के अनुसार, सभी डॉन इस बात से सहमत हो गए, क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं था। जेल से छूटने के कोई आसार नहीं थे और जेलों में उन्हें छोटी-मोटी सुविधाएं भी चाहिए थीं। एजेंसियों की मदद के बदले में स्थानीय प्रशासन से अच्छे खाने, बैरक में अलग रहने, टीवी देखने और जेल के डॉक्टर्स की अच्छी सुविधा मिल सकती थी। एजेंसियों का काम कराने के बहाने उन्हें मोबाइल की भी आवश्यकता होती थी, इसलिए वो सभी 'देशभक्त' हो गए, ताकि जेल का जीवन दुरुह न हो।