दुनिया में बढ़ती हथियारों की होड़ ने लगभग सभी देशों को अपना रक्षा बजट बढ़ाने के लिए मजबूर कर दिया है। हर देश अपने प्रतिस्पर्धी से हथियार और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अग्रणी होने की कोशिश में लगा है। जमीन पर भारी भरकम सेना के बावजूद इस समय दुनिया के अधिकतर देश अंतरिक्ष टेक्नोलॉजी को विकसित और आधुनिक बनाने के लिए प्रयासरत हैं।
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अमेरिका, रूस और चीन ने जहां अंतरिक्ष में अपने पुराने हो चुके सेटेलाइट को मिसाइल के जरिए नष्ट कर दुनिया में खुद को महाशक्तिशाली होने का संदेश दिया। ऐसा माना जा रहा है कि कई और देश जल्द ही यह क्षमता हासिल कर लेगें। जिसमें भारत भी शामिल होगा।
मिसाइल विकास के अलावा इस समय सैन्य उपग्रह (मिलिट्री सेटेलाइट) को प्रक्षेपित करने की भी होड़ मची है। बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि इस मामले में हम कई विकसित देशों से बहुत आगे हैं। जबकि, पाकिस्तान तो हमारे सामने कहीं टिकता ही नहीं है। आगे जानिए कैसी है भारत की अंतरिक्ष में ताकत और सैन्य उपग्रह के मामले में दुनिया से कितना आगे हैं हम?
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किसी भी सैन्य मिशन में गोपनीय जानकारी, नेविगेशन और सैन्य संचार की अहम भूमिका होती है। आधुनिक समय में जनहानि को ध्यान में रखते हुए यह सभी काम सीधे सेटेलाइट के जरिए किए जाते हैं। यह सस्ता, कम जोखिम वाला और तकनीकी रूप से ज्यादा प्रभावी होता है। भारत ने पुलवामा और बालाकोट में स्ट्राइक के समय अपने सैन्य उपग्रहों का बखूबी उपयोग किया था।
कब शुरू हुई थी होड़
प्रतीकात्मक तस्वीर
साल 1960 में अमेरिका और तत्कालीन सोवित संघ में अंतरिक्ष के क्षेत्र में आगे निकलने की खुलेआम होड़ लगी थी। दोनों देश एक दूसरे को पीछे छोड़ने के लिए एक के बाद एक अंतरिक्ष कार्यक्रम लांच कर रहे थे। उसी समय सैन्य उपग्रहों को भी लेकर प्रतिस्पर्धा देखने को मिली। क्योंकि अघोषित शीत युद्ध में सेटेलाइट खुफिया निगरानी करने का एक अहम हथियार था। हालाकि खुफिया जानकारी जुटाने के लिए आज भी इसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।
सैन्य सेटेलाइट्स के मामले में बहुत आगे है अमेरिका
2018 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के पास दुनिया की सबसे ज्यादा सैन्य उपग्रह हैं। एशिया में मिलिट्री सेटेलाइट के मामले में चीन के बाद भारत का स्थान है। अमेरिका के मिलिट्री सेटेलाइट के पहले प्रोजेक्ट का नाम वेपन सिस्टम 117एल था। इसके बाद उन्होंने कई बड़े मिलिट्री सेटेलाइट लॉन्च किए। जिसमें अंतरिक्ष युद्ध की क्षमता रखने वाला वाइडबैंड ग्लोबल SATCOM भी शामिल है।
उरी और पुलवामा हमले के बाद सुरक्षाबलों द्वारा पाक की सरजमीं पर आतंक के विरुद्ध की गई कार्रवाई में इन खुफिया सैन्य उपग्रहों ने बड़ी भूमिका निभाई थी। हमने दुश्मन देश में इसकी मदद से कई खुफिया जानकारियां जुटाई थी। जिसने भारतीय सैन्य मिशन को सफल बनाया।
भारत के पास अभी तक कुल सात सैन्य उपग्रह हैं। हालाकि इनके बेड़े में जल्द ही कुछ नए सदस्य शामिल होने वाले हैं। 1 अप्रैल को प्रक्षेपित होने वाले रॉकेट पीएसएलवी सी 45 के द्वारा एडवांस इलेक्ट्रॉनिक खुफिया उपग्रह के इएमआईएसएटी को अन्य 28 उपग्रहों के साथ पृथ्वी की अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित किया जाएगा।
भारत के सैन्य उपग्रहों की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हम पाकिस्तान ने 87 फीसदी भूभाग पर हल पल नजर रख सकते हैं। इतना ही नहीं, इन उपग्रहों की मदद से हाई-डेफिनेशन (HD) क्वालिटी की तस्वीरें भी लिए जा सकते हैं।
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय खुफिया सेटेलाइट पाक के बड़े भूभाग की लगातार मैपिंग कर रहे हैं। जिसकी जानकारी सुरक्षा एजेंसियों के साथ साझा भी की जा रही है। हालाकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
गणतंत्र दिवस परेड में शामिल संचार वाहन
- फोटो : PTI
बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि पाकिस्तान ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत से पहले काम करना शुरू कर दिया था। जहां हमारे पास 7 आधुनिकतम सैन्य उपग्रह हैं वहीं पाकिस्तान के पास पाकिस्तान रिमोट सेंसिंग (PRSS-1) नाम की एक सेटेलाइट ही है। इसे भी पाक ने अपने जिगरी दोस्त चीन की मदद से लांच किया था।
हमसे बहुत आगे है चीन
सैन्य उपग्रहों के मामले में चीन हमसे बहुत आगे है। चीन के पास लगभग 68 सैन्य उपग्रह हैं। इसका बड़ा कारण भारत से क्षेत्रफल के मामले में उसका कई गुना बड़ा होना भी है। यलो सी पर चल रहे विवाद के कारण इनमें से अधिकतर सेटेलाइट चीन की सामुद्रिक सुरक्षा और निगरानी में लगे हैं। चीन ने याओगन सीरीज में ही 36 सैन्य सेटेलाइट अंतरिक्ष में भेज चुका है।
भारत के अन्य पड़ोसी देशों का क्या है हाल
चीन और पाकिस्तान को छोड़कर भारत के किसी भी पड़ोसी देश के पास कोई भी सैन्य उपग्रह नहीं है। बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार भी हमसे ही उपग्रहों के मामले में सेवाएं लेते हैं।