रक्षा मंत्रालय भारतीय सेना के लिए नई वर्दी लाने की तैयारी कर रही है। यह नई वर्दी विभिन्न क्षेत्रों और मौसम विविधता को ध्यान में रखते हुए तैयार की जाएगी। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक वर्दी का कपड़ अभी निर्धारित नहीं किया गया है क्योंकि कॉटन की देखभाल करना कठिन होता है और टेरीकॉट विभिन्न मौसम की स्थितियों में सौनिकों के लिए आरामदायक नहीं होता।
सेना के एक पूर्व जनरल का कहना है कि वर्दी के पैटर्न में बदलाव सतही है, इसे पहले भी कई बार किया जा चुका है। इससे केवल निजी आपूर्तिकर्ताओं को फायदा होता है।
फाइनेंशियल एक्सप्रेस ऑनलाइन की रिपोर्ट के अनुसार सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल एबी शिवाने ने कहा, 'आपको वर्दी में कैसे देखा जाता है यह गर्व की बात है, लेकिन अधिक महत्वपूर्ण इस वर्दी की गरिमा और सम्मान दोनों को सेवा और सरकार द्वारा सत्ता में सुनिश्चित करना है।'
शिवाने ने कहा कि कार्य और क्षेत्र के मुताबिक गुणवत्ता और बनावट में सुधार होना चाहिए, जो ज्यादा जरूरी है वह है संज्ञानात्मक और नैतिक क्षेत्र।
भीषण मौसमी परिस्थितियां जिनमें सैनिक कार्य करते हैं और समकालीन युद्ध की बदली प्रकृति के अलावा रक्षा मंत्रालय इस बात पर बी विचार कर रहा है कि सर्विस स्ट्रिप किस तरह दिख रही हैं। वर्तमान में रैंक बताने वाली स्ट्रिप कंधे के नीचे होती हैं लेकिन इन्हें अब विश्व की अन्य सेनाओं की तरह सामने की ओर रखी जा सकता है।
सूत्रों ने यह भी बताया कि अंतिम निर्णय लेने से पहले दुनिया की अन्य सेनाओं की वर्दियों का भी अध्ययन किया जा रहा है। सैनिक अच्छे दिखें और आराम से रहें इसके लिए बेल्ट पहनने के तरीके में भी बदलाव आ सकता है, इसके साथ ही शर्ट और पैंट के रंग में भी परिवर्तन हो सकता है।
इससे पहले भारतीय सेना की वर्दी तीन बार बदली जा चुकी है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार सेना की वर्दी में बदलाव इसलिए किया गया ताकि भारतीय सेना और पाकिस्तानी सेना में अंतर स्पष्ट हो सके। दूसरा परिवर्तन 1980 में हुआ जब इसे 'विघटनकारी पैटर्न (डीपी) युद्धक पोशाक' कहा गया।' इसे फिर से बदल दिया गया क्योंकि यह पॉलिस्टर से बना था और गर्म और आर्द्र मौसम में असहज था। वर्दी में तीसरा परिवर्तन 2005 में भारतीय सेना को बीएसएफ (सीमा सुरक्षा बल) और सीआरपीएफ (केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल) से अलग दिखाने के लिए किया गया था।