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India China News Live Updates: भारतीय सैनिकों ने एलएसी पर नाकाम की 500 चीनी सैनिकों की घुसपैठ की कोशिश, पीछे खदेड़ा

Mon, 31 Aug 2020 10:38 PM IST
अनवर अंसारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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india china disputes (file photo) - फोटो : पीटीआई
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भारत और चीन के सैनिकों के बीच एक बार फिर झड़प हुई है। बताया गया है कि 29 अगस्त की रात यह झड़प पेंगोंग त्सो झील के पास हुई है। सरकार ने इस पर कहा है कि हमारे जांबाज जवानों ने चीनी सैनिकों की घुसपैठ को नाकाम कर दिया है। वहीं, सूत्रों ने बताया है कि चीन 500 सैनिकों के साथ घुसपैठ करना चाहता था। 

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भारतीय सेना के पीआरओ कर्नल अमन आनंद ने कहा, 'पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के जवानों ने 29/30 अगस्त की रात को पूर्वी लद्दाख में चल रहे गतिरोध के दौरान दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने के लिए हुई सैन्य और राजनयिक बातचीत का उल्लंघन किया और यथास्थिति को बदलने के लिए घुसपैठ की।'


 

पीआरओ ने कहा, 'भारतीय सेना ने पेंगोंग त्सो झील के दक्षिणी किनारे पर पीएलए के जवानों की इस कायराना हरकत को नाकाम कर दिया। सेना के जवानों ने इस इलाके में हमारी स्थिति को मजबूत किया और जमीनी स्थिति को बदलने के चीनी इरादों को ध्वस्त किया।'
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उन्होंने कहा, 'भारतीय सेना बातचीत के माध्यम से शांति और एकता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन अपनी क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए भी समान रूप से दृढ़ है। सीमा मुद्दों को हल करने के लिए चुशुल में एक ब्रिगेड कमांडर स्तर की फ्लैग मीटिंग चल रही है।'

500 सैनिकों के साथ घुसपैठ की थी योजना
चीन ने भारतीय सीमा में घुसपैठ के लिए बड़े स्तर पर योजना बना रखी थी। सूत्रों ने बताया है कि चीन 500 सैनिकों के साथ घुसपैठ करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन भारतीय जवानों के साहस ने उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया। इससे पता चलता है कि चीन की योजना इस इलाके में अड़ जाने की थी। 

एलएसी पर तनाव के चलते श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर रोकी गई लोगों की आवाजाही
सूत्रों ने बताया है कि एलएसी पर तनाव के चलते श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर लोगों की आवाजाही को रोक दिया गया है। केवल सेना के वाहनों और आवश्यक कार्यों के लिए जाने वाले लोगों को छूट दी गई है। वहीं, अधिकारियों ने कहा है कि खराब मौसम की वजह से श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर आवाजाही रोकी गई है।

चीनी लड़ाकू विमान भर रहे उड़ान
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स (पीएलएएफ) द्वारा होतान एयरबेस पर जे-20 लड़ाकू विमानों को तैनात किया है। बताया गया है कि इन विमानों को झड़प वाली रात से पहले ही तैनात किया गया था। होतान एयरबेस पर लड़ाकू विमानों की तैनाती इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि ये लद्दाख के नजदीक है। चीन ने ये तैनाती रणनीति के तहत की है। मिली जानकारी के अनुसार अब भी लड़ाकू विमान उड़ान भर रहे हैं। 

चीनी सैनिकों ने नहीं पार की सीमा: चीन
चीन के विदेश मंत्रालय ने लद्दाख की पेंगोंग त्सो झील के किनारे हुई इस झड़प पर अपना बयान जारी कर कहा, 'चीनी सैनिकों ने हमेशा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का कड़ाई से पालन किया है और कभी भी रेखा को पार नहीं किया है। दोनों देशों की सीमा के सैनिक इस क्षेत्र के मुद्दों पर आपस में बातचीत करते रहे हैं।'

दोनों देशों के सैनिकों के बीच नहीं हुई शारीरिक झड़प
भारतीय सेना के सूत्रों ने बताया है कि पूर्वी लद्दाख के पेंगोंग त्सो झील के किनारे हुई झड़प में भारतीय और चीनी जवानों के बीच कोई शारीरिक झड़प नहीं हुई है। 

गौरतलब है कि, जून के मध्य में दोनों देशों के जवानों के बीच पूर्वी लद्दाख की गलवां घाटी में हिंसक झड़प हो गई थी। इस झड़प में भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हो गए थे। वहीं, चीन ने इस झड़प में हताहत हुए अपने जवानों की जानकारी को साझा नहीं किया था। हालांकि, एक अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में बताया गया था कि इस घटना में चीन के 35 जवान हताहत हुए थे। 

भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पिछले साढ़े तीन महीने से पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के साथ कई क्षेत्रों में गतिरोध जारी है। भारत इस बात पर जोर देता रहा है कि चीन को अपनी सेना को फिंगर 4 और 8 के बीच के क्षेत्रों से हटाना होगा।

चीन ने भारत को दी पीछे हटने की धमकी  
चीनी सेना का कहना है कि वह भारत को तनाव से बचने के लिए चीन-भारत सीमा से अपने सैनिकों को वापस लेने की मांग करती है: रायटर

पैंगोंग झील के पास ऊंचाई वाली जगह पर भारतीय सेना का कब्ज़ा
सूत्रों के मुताबिक एक विशेष ऑपरेशन बटालियन सहित भारतीय सेना के सैनिकों द्वारा कब्जाई गई एक ऊंचाई वाली जगह, थाकुंग के पास पैंगोंग त्सो झील के दक्षिणी तट पर स्थित है। यह जगह निष्क्रिय पड़ी थी, इसे कब्जे में रखने वाले पक्ष को झील और आसपास के दक्षिणी तट को नियंत्रित करने में रणनीतिक लाभ मिल सकता है।

सूत्रों के अनुसार एक विशेष ऑपरेशन बटालियन को हाल ही में इस क्षेत्र में भेजा गया था और 29-30 अगस्त की रात को इस क्षेत्र में स्थानांतरित किया गया और वहां से इस ऊंचाई वाली जगह पर कब्जा कर लिया, जहां से चीनी सैनिक बमुश्किल कुछ सौ मीटर की दूरी पर मौजूद थे।

ऊंचाई वाली जगह भारतीय क्षेत्र के अंतर्गत आती है, लेकिन चीनी भी इसे अपने पक्ष में होने का दावा करते हैं। मामले और तनाव के समाधान के लिए चुशुल / मोलदो में पहले से ही दो ब्रिगेड कमांडर स्तर की बैठकें हो चुकी हैं लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला है।
 

फिंगर एरिया तक अतिक्रमण करने का प्रयास

चीनी सैनिकों ने फिंगर एरिया (Finger Area) तक अतिक्रमण करने का विफल प्रयास भी किया। उल्लेखनीय है कि भारत ने 1990 के दशक के अंत में वार्ता के दौरान इस क्षेत्र पर अपना दावा किया था। तब चीनी सेना ने यहां एक सड़क निर्माण कर कहा था कि यह अक्साई चीन का हिस्सा है जो उसके नियंत्रण में है।

क्यों महत्वपूर्ण है पेंगोंग झील
  • पेंगोंग झील या पेंगोंग त्सो लद्दाख में भारत-चीन सीमा क्षेत्र में स्थित है। यह 4350 मीटर की ऊंचाई पर स्थित 134 किलोमीटर लंबी है और लद्दाख से तिब्बत तक फैली हुई है।
  • इस झील का 45 किलोमीटर क्षेत्र भारत में स्थित है जबकि 90 किलोमीटर क्षेत्र चीन में पड़ता है। वास्तविक नियंत्रण रेखा इस झील के मध्य से गुजरती है।
  • इसका जल खारा होने के कारण इसमें मछली या अन्य कोई जलीय जीवन नहीं है। परंतु यह कई प्रवासी पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रजनन स्थल है। इसे रैमसर कन्वेंशन के तहत अंतरराष्ट्रीय महत्व की नमभूमि स्थल घोषित किए जाने की चर्चा चल रही है।
  • 19वीं शताब्दी के मध्य में यह झील जॉनसन रेखा के दक्षिणी छोर पर थी। जॉनसन रेखा अक्साई चीन क्षेत्र में भारत और चीन के बीच सीमा निर्धारण का एक प्रारंभिक प्रयास था।
  • इस क्षेत्र में खर्नाक किला है जो इस झील के उत्तरी किनारे पर स्थित है। यह किला अब चीन के नियंत्रण में है। 20 अक्तूबर, 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चीनी सेना ने यहां सैन्य कार्रवाई की थी।
  • पूर्व में इस झील से श्याक नदी (सिंधु नदी की एक सहायक नदी) निकलती थी लेकिन प्राकृतिक बांध के कारण यह बंद हो गई है। 
  • इस झील का भ्रमण करने के लिए एक इनर लाइन परमिट की आवश्यकता होती है क्योंकि यह भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित है।
  • भारतीय नागरिक व्यक्तिगत परमिट प्राप्त कर सकते हैं, अन्य लोगों को एक मान्यता प्राप्त मार्गदर्शक के साथ समूह परमिट (कम-से-कम तीन व्यक्तियों के साथ) होना चाहिए।
  • लेह में स्थित पर्यटन कार्यालय यह परमिट जारी करता है। सुरक्षा कारणों से भारत इस झील में नौकायन की अनुमति नहीं देता है। 
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वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर दशकों से चला आ रहा विवाद

चीन के विदेश मंत्रालय ने दावा किया था कि संपूर्ण गलवां घाटी ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ के चीनी पक्ष पर स्थित है और इसलिए यह चीन का हिस्सा है। वहीं भारत ने चीन के इस दावे को अतिरंजित और असमर्थनीय बताया है।

कहां है गलवां घाटी?
  • गलवां घाटी सामान्यतः उस भूमि को संदर्भित करती है, जो गलवां नदी के पास मौजूद पहाड़ियों के बीच स्थित है।
  • गलवां नदी का स्रोत चीन की ओर अक्साई चीन में मौजूद है और आगे चल कर यह भारत की श्योक नदी से मिलती है।
  • गौरतलब है कि यह घाटी पश्चिम में लद्दाख और पूर्व में अक्साई चीन के बीच स्थित है, जिसके कारण यह रणनीतिक रूप से काफी महत्त्वपूर्ण है।
  • इसका पूर्वी हिस्सा चीन के झिंजियांग तिब्बत मार्ग से काफी नजदीक है, जिसे जीG219 राजमार्ग कहा जाता है।

वास्तविक नियंत्रण रेखा
  • वास्तविक नियंत्रण रेखा एक प्रकार की सीमांकन रेखा है, जो भारतीय-नियंत्रित क्षेत्र और चीनी-नियंत्रित क्षेत्र को एक दूसरे से अलग करती है।
  • जहां एक ओर भारत मानता है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा की लंबाई लगभग 3,440  किलोमीटर है, वहीं चीन इस रेखा को तकरीबन 2,000 किलोमीटर लंबा मानता है।

चीन का हठ
  • उल्लेखनीय है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा गलवां घाटी और श्योक नदियों के संगम के पूर्व में स्थित है, जिस पर भारत और चीन दोनों हाल के वर्षों में पेट्रोलिंग कर रहे हैं।
  • 15 जून 2020 को हुई हिंसक झड़प के बाद चीन ने दावा किया है कि संपूर्ण गलवां घाटी चीन के नियंत्रण क्षेत्र में आती है। 
  • गौरतलब है कि बीते महीनों से चीन गलवां घाटी और श्योक नदी के संगम तथा वास्तविक नियंत्रण रेखा के बीच के क्षेत्र में भारत की सड़क निर्माण गतिविधियों पर आपत्ति जता रहा है। भारत ने चीन के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है।
  • चीन के लगभग सभी मानचित्रों में संपूर्ण गलवां घाटी को चीन के नियंत्रण वाले क्षेत्र का हिस्सा दिखा जाता है।
  • गौरतलब है कि वर्ष 1956 का मानचित्र संपूर्ण गलवां घाटी को भारत के एक हिस्से के रूप में प्रदर्शित करता है, हालांकि जून 1960 में चीन ने गलवां घाटी पर अपनी संप्रभुता का दावा करते हुए एक नया मानचित्र प्रस्तुत प्रस्तुत किया, जिसमें गलवां घाटी को चीन के हिस्से के रूप में दिखाया गया था।
  • इसके बाद नवंबर 1962 में भी एक नया मानचित्र जारी किया गया था, जिसमें संपूर्ण गलवां घाटी पर दावा प्रस्तुत किया गया था। लेकिन इसके बाद चीन की सरकार द्वारा जारी किए गए नक्शों में गलवां नदी के पश्चिमी सिरे को चीन के हिस्से के रूप में नहीं दिखाया गया।
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