लेखकों का कहना है कि सभी देशों की खुफिया एजेंसियों को वैश्विक घटनाओं और स्थानीय प्रभावों के बीच बेहतर तालमेल बनाने के लिए विश्लेषणात्मक क्षमताएं विकसित करनी होंगी, ताकि उथल-पुथल वाले भू-राजनैतिक माहौल में अचानक अस्थिर सामाजिक और राजनीतिक उभार को समय रहते रोका जा सके।
वैश्विक खुफिया व्यवस्था भू-राजनीतिक अस्थिरता और तेजी से बदलती तकनीक के कारण बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। ऐसे में भारत को अपनी खुफिया क्षमताओं को बढ़ाना और मजबूत करना बेहद जरूरी है। यह चेतावनी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) की एक नई रिपोर्ट ने दी है। स्वॉर्ड्स एंड शील्ड्स: नेविगेटिंग द मॉडर्न इंटेलिजेंस लैंडस्केप नामक इस रिपोर्ट को ओआरएफ अध्यक्ष समीर सरन और ओआरएफ के नॉन-रेजिडेंट फेलो व ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधार्थी आर्चिशमन रे गोस्वामी ने लिखा है।
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रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटल कनेक्टिविटी, वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव और निजी खुफिया एजेंसियों के उभार के कारण पारंपरिक खुफिया प्रणालियां दबाव में हैं। रिपोर्ट कहती है कि जियोटेक्नोग्राफी अवधारणा से सब बदल रहा है। इसमें भौगोलिक और डिजिटल दुनिया आपस में जुड़ जाती हैं और राजनीतिक पहचान और विचार तेजी से बदलते हैं।
तकनीकी एकीकरण भी है जरूरी
आधुनिक इंटेलिजेंस में अब केवल मानवीय संपर्कों पर निर्भर रहना काफी नहीं होगा है। भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल कर बड़े डाटा सेट का विश्लेषण करने की क्षमता बढ़ानी होगी। रिपोर्ट ने चेताया है कि बिग टेक कंपनियों के पास मौजूद विशाल डाटा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहा है।
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नए तरीके अपनाने पर दिया जोर
रिपोर्ट के मुताबिक प्रतिस्पर्धी राष्ट्र महत्वपूर्ण भौतिक संसाधनों, विशेष रूप से दुर्लभ-पृथ्वी तत्वों पर प्रभाव हासिल करने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। ये सामग्रियां आधुनिक प्रौद्योगिकियों के लिए केंद्रीय महत्व रखती हैं और इनसे रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में और अधिक तीव्रता आने की उम्मीद है, जिसके लिए खुफिया एजेंसियों को पारंपरिक क्षेत्रीय अभियानों से परे जाकर नए तरीके अपनाने होंगे।