केंद्रीय कैबिनेट ने आपराधिक कानून संशोधन अध्यादेश, 2018 को मंजूरी देने के साथ ही कहा है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) राष्ट्रीय स्तर पर यौन अपराधियों का डाटा संरक्षित करेगा। ये डाटा नियमित तौर पर राज्य सरकारों और केंद्र शासित राज्यों के साथ साझा किया जाएगा। भारत ऐसा डाटाबेस तैयार कर यौन अपराधियों पर नजर रखने वाला नौवां देश हो जाएगा।
ह्यूमन राइट वाच (एचआरडब्ल्यू) और एसीयूएल जैसे कई संगठन यौन अपराधियों के पंजीयन का विरोध करते रहे हैं। इनका दावा है कि ऐसा करना पुनर्वास के सिद्घांत के खिलाफ है। अमेरिकी सरकार के आंकड़े बताते हैं कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के ज्यादातर मामलों में परिवार के करीबी लोग ही शामिल होते हैं।
ह्यूमन राइट वाच की जयश्री बजोरिया ने कहा कि भारत में भी ऐसे मामलों में जान-पहचान के लोग ही शामिल पाए जाते हैं। सरकार को पॉक्सो कानून समेत मौजूदा मानकों को सख्ती से लागू कराना सुनिश्चित करना चाहिए।
फायदे से ज्यादा नुकसान करेगी सूची : एचआरडब्ल्यू
अमेरिका में यौन अपराधियों का डाटाबेस सार्वजनिक है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, आयरलैंड, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, त्रिनिदाद व टोबैगो और ब्रिटेन में यह डाटाबेस न्याय व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों तक सीमित रहता है। फिलहाल स्पष्ट नहीं है कि भारत में यह डाटाबेस सार्वजनिक होगा या नहीं।
बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले हक सेंटर की भारती अली ने कहा, ‘मुझे चिंता है कि इस डाटाबेस के तैयार होने के बाद पीड़ित शिकायत दर्ज कराएंगे भी या नहीं। साथ ही एक बार किसी का नाम इस डाटाबेस में दर्ज होने के बाद न तो उसे कोई नौकरी मिलेगी और न ही उसका पुनर्वास हो पाएगा।’ ह्यूमन राइट वाच की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी सूची फायदे से कहीं ज्यादा नुकसान करेगी।