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India Targets Pakistan: भारत-पाकिस्तान संघर्ष पर अफगानिस्तान का रुख क्या, कैसे दिल्ली ने तालिबान को साधा?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Fri, 16 May 2025 05:25 PM IST

सार

भारत और पाकिस्तान में तनाव के बीच अफगानिस्तान से हमारे रिश्तों में क्या नया हुआ है? भारत-अफगानिस्तान के विदेश मंत्रियों के बीच क्या चर्चा हुई है? यह संभव कैसे हुई? आइये जानते हैं...
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भारत और पाकिस्तान में संघर्ष के बीच अफगानिस्तान का तटस्थ रुख। - फोटो : अमर उजाला
भारत की तरफ से ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद दुनिया के अधिकतर देश इस मुद्दे पर बोलने से बचे हैं। चीन, तुर्किये जैसे कुछ देशों को छोड़ दिया जाए तो पाकिस्तान की मध्यस्थता की अपील और बार-बार मदद मांगने के बावजूद कई देशों ने उसकी दलीलों पर ध्यान तक नहीं दिया है। इसे राजनयिक स्तर पर भारत की बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है। मजेदार बात यह है कि भारत और पाकिस्तान के पड़ोसी अफगानिस्तान ने सामने से इस पूरे संघर्ष में तटस्थता दिखाई है, लेकिन राजनयिक स्तर पर यह देश लगातार भारत से बातचीत में जुटा था। इसका पहला खुलासा गुरुवार को हुआ, जब भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने तालिबान के कार्यकारी विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी से आधिकारिक तौर पर फोन पर बातचीत की। 
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भारत और पाकिस्तान में संघर्ष के बीच अफगानिस्तान का तटस्थ रुख। - फोटो : अमर उजाला
भारत की तरफ से ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद दुनिया के अधिकतर देश इस मुद्दे पर बोलने से बचे हैं। चीन, तुर्किये जैसे कुछ देशों को छोड़ दिया जाए तो पाकिस्तान की मध्यस्थता की अपील और बार-बार मदद मांगने के बावजूद कई देशों ने उसकी दलीलों पर ध्यान तक नहीं दिया है। इसे राजनयिक स्तर पर भारत की बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है। मजेदार बात यह है कि भारत और पाकिस्तान के पड़ोसी अफगानिस्तान ने सामने से इस पूरे संघर्ष में तटस्थता दिखाई है, लेकिन राजनयिक स्तर पर यह देश लगातार भारत से बातचीत में जुटा था। इसका पहला खुलासा गुरुवार को हुआ, जब भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने तालिबान के कार्यकारी विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी से आधिकारिक तौर पर फोन पर बातचीत की। 

बता दें कि यह पहली बार है जब भारत और तालिबान के शासन वाले अफगानिस्तान के बीच राजनीतिक स्तर पर संपर्क हुआ हो। हालांकि, ऐसा नहीं है कि भारत ने पाकिस्तान से तनाव के बीच अचानक ही अफगान शासन से संपर्क साधा हो। भारत लगातार प्रशासनिक और राजनयिक स्तर पर तालिबान के साथ संपर्क में रहा है और भारत के विदेश सचिव अफगान विदेश मंत्री से पहले मिल भी चुके हैं।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत और पाकिस्तान में तनाव के बीच अफगानिस्तान से हमारे रिश्तों में क्या नया हुआ है? भारत-अफगानिस्तान के विदेश मंत्रियों के बीच क्या चर्चा हुई है? यह संभव कैसे हुई? आइये जानते हैं...

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पहले जानें- भारत-अफगानिस्तान के बीच रिश्तों में नया क्या हुआ?
15 मई को भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अफगानिस्तान के कार्यकारी विदेश मंत्री अहमद खान मुत्तकी से पहली बार आधिकारिक तौर पर बातचीत की। यहां सबसे अहम पहलू यह है कि भारत की सरकार के अब तक राजनयिक स्तर पर अफगानिस्तान के तालिबान प्रशासन के साथ संपर्क नहीं हैं, लेकिन अब राजनीतिक स्तर पर दोनों देशों की पहली बार बातचीत हुई है। 

इस बातचीत की टाइमिंग इसलिए भी अहम है, क्योंकि पहलगाम में हुए आतंकी हमले के ठीक बाद तालिबान ने इसकी कड़े शब्दों में निंदा की थी। बताया जाता है कि पाकिस्तान की अफगानिस्तान में की जा रही सैन्य कार्रवाई और सीमा विवाद से जुड़े मुद्दों को लेकर तालिबान कई बार रोष जता चुका है और पलटवार की चेतावनी भी देता है। 

जयशंकर-मुत्तकी के बीच क्या बातचीत हुई?
जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा, "अफगानिस्तान के विदेश मंत्री से अच्छी बातचीत हुई। उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा की। अफगानिस्तान और भारत के बीच अविश्वास फैलाने की हालिया कोशिशों को उन्होंने दृढ़ता से खारिज किया, जिसकी हम सराहना करते हैं।" उन्होंने कहा कि हमने अफगान लोगों से पारंपरिक मित्रता और उनके विकास के लिए भारत के निरंतर समर्थन को दोहराया। आगे सहयोग बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा हुई।

गौरतलब है कि कुछ समय पहले ही पाकिस्तानी मीडिया ने अफगानिस्तान तालिबान और पाकिस्तान तालिबान के जुड़ाव को रेखांकित किया था। साथ ही भारत को अफगानिस्तान के जरिए पाकिस्तान में तनाव पैदा करने का जिम्मेदार बताया था। अफगान तालिबान ने इसे लेकर पाकिस्तान को लताड़ लगाई थी। अब जयशंकर ने भी इस मुद्दे को चिह्नित करते हुए कहा कि हाल ही में भारत और अफगानिस्तान के बीच झूठी और निराधार रिपोर्ट्स के जरिए अविश्वास पैदा करने की कोशिशें की गईं। लेकिन मुत्तकी ने जिस तरह इन कोशिशों को नाकाम कर दिया, हम उसका स्वागत करते हैं। 

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दूसरी तरफ अफगानिस्तान की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में कोई जिक्र नहीं किया गया। हालांकि, भारत और अफगानिस्तान के रिश्तों को लेकर काफी चर्चा की बात सामने आई। तालिबान के विदेश मंत्रालय में सार्वजनिक संचार के निदेशक हाफिज जिया अहमद ने कहा कि मुत्तकी ने जयशंकर से अपने देश के नागरिकों के लिए ज्यादा वीजा मुहैया कराने की मांग की। खासकर स्वास्थ्य मामलों से जुड़े वीजा उपलब्ध कराने की। इसके अलावा दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार, भारतीय जेलों में बंद अफगान कैदी और ईरान के करीब बन रहे चाबहार बंदरगाह पर भी बात हुई।

क्या हैं दोनों विवाद, जिस पर आमने-सामने हैं अफगानिस्तान-पाकिस्तान?

1. सीमा विवाद
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच एक काल्पनिक डूरंड रेखा को सीमा माना जाता है। हालांकि, अंग्रेजों की बनाई इस रेखा को अफगानिस्तान शुरुआत से ही नकारता रहा है। उसका कहना है कि ब्रिटिश अफसरों ने उसके पश्तो समुदायों को अलग करने के लिए यह रेखा खींची। इसी डूरंड रेखा को पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच विवाद की बड़ी वजह माना जाता है। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि तालिबान के आने के बाद वह अफगानिस्तान से जमीन छीन सकता है या इससे जुड़े विवाद सुलझा सकता है। 

हालांकि, तालिबान ने पाकिस्तान की इस नीति को मंजूर नहीं किया। अपना शासन आने के बाद तालिबान ने यहां अपना दावा मजबूत करने के लिए कुछ सुरक्षा चौकियों का निर्माण भी शुरू किया है। इसे लेकर दोनों पक्षों के बीच कुछ समय पहले ही झड़पें भी देखी गईं। इसी साल सितंबर में पाकिस्तान-तालिबान के बीच भारी गोलीबारी हुई। अफगानिस्तान के खोस्त प्रांत में हुए इन हमलों में अफगान तालिबान के दो वरिष्ठ कमांडर खलील और जान मोहम्मद समेत आठ तालिबानी लड़ाकों की मौत हुई। 

2. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी)
काबुल और इस्लामाबाद के बीच विवाद की दूसरी सबसे बड़ी वजह है तालिबान के समर्थन वाले तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की आतंकी गतिविधियां। 2007 में पाकिस्तान में कई आतंकी संगठनों के गठबंधन से बने टीटीपी ने लगातार पाकिस्तानी सेना और प्रशासन को नुकसान पहुंचाया है। टीटीपी और तालिबान का ऐतिहासिक जुड़ाव रहा है। टीटीपी के लड़ाके वही हैं, जिन्हें एक समय पाकिस्तान में तैयार किया गया था ताकि अफगानिस्तान में पश्चिमी देशों के खिलाफ लड़ाई को बढ़ावा दिया जा सके। हालांकि, पाकिस्तान का यह दांव उल्टा पड़ गया। 

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अफगानिस्तान पर फतह हासिल करने के बाद अब टीटीपी का पूरा ध्यान पाकिस्तान में शरिया कानून और कई कड़े नियम लागू करने पर है। वहीं, ऐतिहासिक जुड़ाव होने के चलते अफगान तालिबान टीटीपी के लड़ाकों को कई मौकों पर संरक्षण देता रहा है। दोनों देशों के बीच 2640 किलोमीटर की सीमा पर सुरक्षा के कमजोर इंतजामों के चलते टीटीपी के आतंकी मनमर्जी से पाकिस्तान पर हमले करने के बाद अफगानिस्तान के सीमाई इलाकों में छिप जाते हैं। 

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