भारत की ई-संजीवनी योजना पूरी दुनिया के स्वास्थ्य के लिए संजीवनी है। भारत की टेलीमेडिसिन योजना डिजिटल मंच पर काफी प्रभावी है और इसके जरिए दुनियाभर में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं को मजबूत किया जा सकता है। द लैंसेट रीजनल हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन में यूके और जर्मनी के शोधकर्ताओं ने कहा है कि भारत की निःशुल्क राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन सेवा ई-संजीवनी ने अब तक 30 करोड़ से ज्यादा लोगों तक चिकित्सा परामर्श उपलब्ध कराई है।
कोरोना महामारी में बनी संजीवनी
कोरोना महामारी के दौरान इस योजना के जरिए भारत में करीब 10 करोड़ से ज्यादा लोगों ने घर बैठे ऑनलाइन चिकित्सा मदद प्राप्त की। इस परिवर्तनकारी पैमाने और क्षमता को देखते हुए ई-संजीवनी टेलीमेडिसिन दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ दुनिया के अन्य हिस्सों में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं को काफी मजबूती दे सकती है।
वहीं जर्मनी के हीडलबर्ग इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ और यूके के सैलफोर्ड विवि, ऑक्सफोर्ड विवि और कैम्ब्रिज विवि के इस संयुक्त अध्ययन में भारत की ओर से कोलकाता के स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान संस्थान और जीडी इंस्टीट्यूट फॉर फर्टिलिटी रिसर्च के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया है।
जी-20 सम्मेलन में कई देशों ने सराहा
वहीं इसको लेकर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. अनंत आर जानी ने अध्ययन में कहा है कि विश्व स्तर पर टेलीमेडिसिन का चलन काफी तेजी से बढ़ रहा है। हाल ही में भारत की अध्यक्षता में हुए जी 20 सम्मेलन में भी सदस्य देशों ने तकनीक के इस स्वरूप को लेकर कई सत्रों में चर्चा भी की है। इनमें से कुछ देशों ने भारत जैसे मॉडल को अपने देश में लागू करने के लिए सहमत पत्र पर हस्ताक्षर भी किए हैं।
हालांकि ई-संजीवनी को एक शिक्षण टेली हेल्थकेयर प्रणाली में बदलने पर भी विचार किया जा सकता है, जिससे भारत के राज्यों के भीतर अधूरी जरूरतों, प्रथाओं में भिन्नता और अपनाने की पहचान करने के साथ साथ उन्हें संबोधित करने में सुविधा होगी।