बाहुबली: जीएसएलवी मार्क 3
जियोसिंक्रोनस लॉन्च व्हीकल मार्क 3 भारत में अब तक बना सबसे शक्तिशाली रॉकेट है। यही चंद्रयान 2 को चंद्रमा की कक्षा तक ले जाएगा। इसे बाहुबली नाम दिया गया है क्योंकि इसमें चार हजार किलो वजनी उपग्रह व उपकरणों को अंतरिक्ष में ले जाने की क्षमता है। इससे दोगुना वजन यह पृथ्वी की निचली कक्षा में 600 किमी ऊंचाई पर ले जा सकता है। 43.43 मीटर ऊंचा यह लॉन्चर चंद्रयान को तीन चरण में अपने क्रायोजेनिक इंजन और दो बूस्टरों की मदद से चंद्रमा तक ले जाएगा।
ऑर्बिटर : एक वर्ष की परिक्रमा
चंद्रमा की कक्षा में ऑर्बिटर एक वर्ष परिक्रमा करेगा। यह 2,379 किलो वजनी है और सूर्य की किरणों से हजार वॉट बिजली पैदा कर सकता है। चंद्रमा पर अपने अध्ययन और विभिन्न उपकरणों द्वारा भेजी गई सूचनाओं को ऑर्बिटर बंगलूरु में मौजूद इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क (आईडीएसएन) में भेजेगा।
लैंडर विक्रम : जिसका एक दिन का काम हमारे 14 के बराबर
लैंडर विक्रम को यह नाम भारतीय खगोल कार्यक्रम के पितामह कहे जाने वाले डॉ. विक्त्रस्म साराभाई पर मिला है। यह पूरे एक चंद्र दिवस काम करेगा, जो हमारे 14 दिन के बराबर हैं। इसमें भी आईडीएसएन से सीधे संपर्क करने की क्षमता है। और ऑर्बिटर और रोवर दोनों को भी सीधे सूचनाएं भेजेगा।
रोवर - प्रज्ञान करेगा चंद्रमा पर 500 मीटर सैर
प्रज्ञान यानी बुद्धिमत्ता, चंद्रयान का चंद्रमा पर उतरने जा रहा यह 27 किलो का रोवर मौके पर ही प्रयोग करेगा। इसमें 500 मीटर तक चलने की क्षमता है। इसके लिए यह सौर ऊर्जा का उपयोग करेगा। 27 किलो का यह रोवर 50 वॉट बिजली पैदा करेगा, जिसका उपयोग चंद्रमा पर मिले तत्वों का एक्सरे और लेजर से विश्लेषण करेगा।
लैंडर चंद्रमा पर भूकंप की जांच करेगा
लैंडर जहां उतरेगा उसी जगह पर यह जांचेगा कि चांद पर भूकंप आते है या नहीं। वहां तापमान और चंद्रमा का घनत्व कितना है। रोवर चांद के सतह की रासायनिक जांच करेगा।
इस मिशन का सबसे कठिन हिस्सा है चंद्रमा की सतह पर सफल और सुरक्षित लैंडिंग कराना। चंद्रयान-2 चंद्रमा की सतह से 30 किमी की ऊंचाई से नीचे आएगा। उसे चंद्रमा की सतह पर आने में करीब 15 मिनट लगेंगे।
यह 15 मिनट इसरो के लिए जीवन-मरण का प्रश्न होगा, क्योंकि मिशन की कामयाबी इसी 15 मिनट पर टिकी होगी। लॉन्च के बाद अगले 16 दिनों में चंद्रयान-2 पृथ्वी के चारों तरफ 5 बार कक्षा बदलेगा। इसके बाद 6 सितंबर को चंद्रयान-2 की चांद के दक्षिणी ध्र्रुव के पास लैंडिंग होगी।
इसके बाद रोवर को लैंडर से बाहर निकलने 4 घंटे लगेंगे। इसके बाद, रोवर 1 सेंटीमीटर प्रति सेकंड की गति से करीब 15 से 20 दिनों तक चांद की सतह से डाटा जमा करके लैंडर के जरिए ऑर्बिटर तक पहुंचाता रहेगा। ऑर्बिटर फिर उस डाटा को इसरो को भेजेगा।
चंद्रयान- 2 मिशन टाइम लाइन, कब क्या होगा
- 18 सितंबर 2008 : तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चंद्रयान 2 मिशन
- को सहमति दी, योजना शुरू हुई
- 9 जुलाई से 16 जुलाई 2019 के बीच मिशन को लॉन्च करने का निर्णय हुआ
- 15 जुलाई सुबह 2.51 बजे की तारीख तय हुई, इसे श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया जाएगा
- 6 सितंबर 2019 : लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर उतरेंगे
- रोवर प्रज्ञान चंद्रमा की सतह पर चलेगा और परीक्षण करेगा
- एक चंद्र दिवस यानी 14 दिन तक यहां वैज्ञानिक परीक्षण किए जाएंगे
- एक वर्ष तक चंद्रयान 2 चंद्रमा की परिक्त्रस्मा करते हुए विभिन्न प्रयोग
- करेगा और डाटा जुटाता रहेगा
जब कलाम ने कहा था, चांद के चक्कर लगा सकते हैं तो उस पर क्यों नहीं उतरें
16 साल पहले यानी 2003 में जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिक चंद्रमा पर मिशन भेजे जाने की योजना बना रहे थे तब उस वक्त वैज्ञानिक समुदाय से डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था कि एक दिन ऐसा जब देश इस उपलब्धि को हासिल कर लेगा।
यह किसी रोशनी भर देने जैसा होगा। इससे पूरा देश रोशन होगा, खास तौर युवा वैज्ञानिकों और बच्चों के बीच यह बेहद उत्साह भरने वाला होगा। कलाम उस वक्त देश के राष्ट्रपति थे। इसके एक साल बाद जब वैज्ञानिकों की एक टीम कलाम से मिलने पहुंची। टीम का चंद्र मिशन का मकसद था कि चंद्रमा की 100 किमी की कक्षा में चक्कर लगाना।
कलाम ने कहा था कि जब चांद के चक्कर लगा सकते हैं तो वहां यान को उतारा भी तो जा सकता है। यह मुलाकात देश के पहले चंद्रमिशन चंद्रयान-1 के लिए थी। ये बातें कलाम की याद में 2015 में आयोजित एक सेमिनार में चंद्रयान-1 के परियोजना निदेशक रहे एम अन्नादुरई कही थीं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति कलाम ने कहा था कि जब आप चंद्रमा के इर्द-गिर्द जा सकते हो तो उसकी सतह पर क्यों नहीं उतर सकते। उनकी इस बात से वैज्ञानिक समुदाय को काफी संबल मिला।
नील आर्मस्ट्रांग की कदम रखने की 50वीं सालगिरह
चंद्रयान-2 मिशन की शुरुआत 15 जुलाई को उस वक्त हो रही है कि जब पांच दिन बाद यानी 20 जुलाई को इस साल इंसान के चांद पर कदम रखने के 50 साल पूरे हो रहे हैं। 20 जुलाई 1969 को अमरीकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रॉन्ग चंद्रमा पर पैर रखने वाले पहले इंसान बने थे। नील, नासा के सबसे काबिल अंतरिक्ष यात्रियों में से एक थे।
इसरो चेयरमैन के सिवन ने बताया कि चंद्रयान 2 के बाद भारत 2021 के गगनयान प्रोजेक्ट पर ध्यान केंद्रित करेगा। यह मानव मिशन होगा। इसकी तैयारी के तहत दिसंबर 2020 और जुलाई 2021 में मानवरहित मिशन अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे। इसके बाद दिसंबर 2021 में मानव अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे। इन अंतरिक्ष यात्रियों के चयन की प्रक्रिया जारी है।
एक हजार करोड़ का मिशन, बारिश में भी प्रक्षेपण
भगवान वेंकटेश की पूजा में तिरुमाला पहुंचे सिवन ने बताया कि चंद्रयान 2 प्रक्षेपण के लिए तैयार है। इस पर करीब एक हजार करोड़ की लागत आई है। बारिश से मिशन की रवानगी को खतरा नहीं है क्योंकि जीएसएलवी मार्क3 पर बारिश में भी सुरक्षित रहेगा।