कृष्णा-गोदावरी बेसिन में समुद्र के नीचे बड़े भूस्खलन के सबूत मिले हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, करीब 11 घन किमी तलछट खिसकने की घटना 2009 से 2015 के बीच हुई हो सकती है। क्या समुद्र के नीचे होने वाली ऐसी घटनाएं सुनामी और तटीय इलाकों के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं?
देश में पहाड़ और चट्टानें खिसकने की घटनाएं तो सामने आती रहती हैं, लेकिन समुद्र की गहराई में भी जमीन का बड़ा हिस्सा अचानक खिसकने लगा है। वैज्ञानिकों को बंगाल की खाड़ी में कृष्णा-गोदावरी बेसिन के नीचे समुद्र तल में हुए एक बेहद बड़े भूस्खलन के सबूत मिले हैं।
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राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (सीएसआईआर) की रिपोर्ट के मुताबिक, घटना 2009 से 2015 के बीच की हो सकती है और इसमें करीब 11 घन किमी तलछट समुद्र की ढलान से खिसक गई थी। यही कारण है कि पहली बार सरकार ने ऐसे समुद्र के नीचे होने वाले भूस्खलन और ढलान टूटने से पैदा होने वाले खतरे को बड़े स्तर पर समझने की तैयारी शुरू कर दी है। इसको लेकर राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र में देश के प्रमुख समुद्री और भू-विज्ञान विशेषज्ञों की बैठक हुई, जिसमें भारतीय समुद्री किनारों पर समुद्र के नीचे ढलान टूटने की घटनाओं, उनके कारणों और उनसे पैदा होने वाले सुनामी जैसे खतरों का आकलन करने का फैसला हुआ।
समुद्र के अंदर भूस्खलन हुआ तो सुनामी जैसी तबाही का खतरा
राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के अनुसार, समुद्र के नीचे जमीन खिसकने से पानी का बड़ा हिस्सा अचानक विस्थापित हो सकता है। इससे सुनामी जैसी बड़ी समुद्री लहरें पैदा होने की आशंका है। पूर्वी भारत के समुद्री क्षेत्र में किए गए एक अन्य अध्ययन में गोदावरी बेसिन में प्राचीन समय की दो विशाल समुद्री भूस्खलन घटनाओं के सबूत मिले हैं। इनमें एक का फैलाव करीब 20,400 वर्ग किमी और दूसरे का करीब 32,000 वर्ग किमी था। दोनों घटनाओं में समुद्र के नीचे खिसकी सामग्री सैकड़ों किलोमीटर तक गई थी।
समुद्र में कम्युनिकेशन के लिए केबलें बिछी हैं। डिजिटल युग में ये बेहद अहम हैं। समुद्री भूस्खलन इन केबलों को नुकसान पहुंचा सकता है।
इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय संचार सेवाओं पर असर पड़ सकता है।
कृष्णा-गोदावरी बेसिन के अध्ययन में भी समुद्री भूस्खलन को समुद्री ढांचों, संचार केबलों और तटीय आबादी के लिए संभावित खतरा बताया गया है।