एशिया में भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां की संसद में 2016 में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को झटका लगा है। यह बात अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्वसंध्या पर वैश्विक अंतर-संसदीय संस्था की रिपोर्ट में कही है।
8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से ठीक पहले अंतर-संसदीय संगठन (आईपीयू) द्वारा जारी की गई ‘वुमेन इन पार्लियामेंट इन 2016 : दि ईयर इन रिव्यू’ में कहा गया है कि संसद में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने के लिए अधिक महत्वाकांक्षी निर्णयों और मजबूत राजनीतिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। इसके साथ ही पिछले दशकों में दुनियाभर में हासिल की गई महत्वपूर्ण प्रगति को बनाए रखने की भी आवश्यकता है। रिपोर्ट में निर्णय लेने की प्रक्रिया के साथ महिलाओं की आवाज को सशक्त करने के लिए नई मुहिम छेड़ने पर भी जोर दिया गया।
रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि पिछले सालों की तरह महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण को हल्के में नहीं लिया जा सकता। क्षेत्रीय समूहों की गुणवत्ता को रेखांकित करते हुए इसमें कहा गया है कि संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 0.5 फीसदी बढ़ा है। वर्ष 2015 में जहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व 18.8 फीसदी था वहीं पर 2016 में 19.3 फीसदी रहा।