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भारत-नेपाल: सीमा पर भय, रिश्तों में संशय

Sat, 20 Jun 2020 05:23 AM IST
योगेश साहू शेखर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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भारत-नेपाल सीमा - फोटो : Amar Ujala
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भारत-नेपाल में बडे़ भाई-छोटे भाई का नाता वर्षों से चला आ रहा है। उसकी तमाम जरूरतें भारत ही पूरा करता रहा है। काठमांडू हवाई अड्डे का निर्माण हो या भूकंप में मदद, भारत ने आगे बढ़कर सहायता की। व्यापार, शिक्षा, इलाज से लेकर सांस्कृतिक-आध्यात्मिक रूप से दोनों देश एक-दूसरे के बेहद करीब रहे हैं।

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अंग्रेजों ने अपने हित साधने के लिए तमाम प्रयास किए, लेकिन दोनों के रिश्तों पर खास असर नहीं पड़ा । सवाल है, आज ऐसी कौन की परिस्थिति पैदा हो गईं, जिससे नेपाल की मौजूदा सरकार इतिहास दरकिनार कर भारतीय क्षेत्रों को अपना बता रही है।

भारत-नेपाल के सीमा विवाद के मूल में नेपाल युद्ध के बाद 4 मार्च 1816 को हुई सिगौली की संधि है। यह संधि बराबरी पर आधारित नहीं थी। कंपनी शासन ने अपने निर्णय नेपाल पर थोपे थे। गोरखा साम्राज्य का लगभग एक तिहाई ले लिया गया था।
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संधि की धारा 5 के अनुसार, काली से पश्चिम के किसी भूभाग पर नेपाल का अधिकार समाप्त हो गया। काली भारत और नेपाल की सीमा मानी गई, बिना यह जाने कि उस क्षेत्र का वास्तविक भूगोल क्या है? बाद में कालापानी से बरमदेव (टनकपुर) तक काली नदी भारत-नेपाल सीमा बन गई। तब कुमाऊं का कोई नक्शा उपलब्ध नहीं था और वार्ताकारों को अंतरवर्ती क्षेत्र की जानकारी नहीं थी।

गोरखा साम्राज्य के बनने से पहले भी नेपाली राज्य भारत से सीमा बनाते थे। उत्तर में तिब्बत था। पर 1948 के बाद यह सीमा आधुनिक चीन के साथ हो गई। दो ओर से दो कठिन पड़ोसियों से घिरे नेपाल के तिब्बत के साथ मूलतः व्यापारिक लेकिन भारत के साथ व्यापक रिश्ते सदियों से रहे हैं।

बहुत से मामलों में भारत और नेपाल की विरासत साझा रही है। 1769 में पृथ्वीनारायण शाह द्वारा स्थापित गोरखा साम्राज्य की सेना 1790 में कुमाऊं आ गई। साम्राज्य पूर्व में मे चीन और तीस्ता से पश्चिम में काली, अलकनन्दा और सतलज या ब्यास नदी तक गया। फिर नदियां ही सिमटने के बाद की सीमाएं बनी।

लिपुलेख पर तीन राज्यों की नजर थी

ऊपरी ब्यास क्षेत्र एक त्रिकोण पर स्थित था, जहां तीन देश ही नहीं, काली, करनाली और सतलज नदियां मिलती थीं। लिपुलेख दर्रा तीन राजव्यवस्थाओं की नजर में था, कुमाऊं के चंद, पश्चिमी नेपाल के जुमली और तिब्बत के शासक। कुछ समय तिब्बती व जुमली राज भी यहां रहा।

1790 में गोरखों के कुमाऊं आगमन के बाद ही ब्यास को जुमला राज से मुक्ति मिली।  स्थानीय समाज को अपनी और व्यापार की सुरक्षार्थ तीनों सामंती व्यवस्थाओं से संबंध बनाये रखने पड़ते थे। अनेक बार तीनों को घोषित-अघोषित कर देने पड़ते थे। सदियों से व्यापारी दर्रों को पार कर तिब्बत की मंडियों तक व तीर्थयात्री कैलाश मानसरोवर जाते रहे।

मानसखंड (स्कंदपुराण का हिस्सा) में लिपुलेख को ‘लिपि पर्वत’ और काली नदी को ‘सत्य वाहिनी’ या ‘श्यामा’ कहा गया है। लिपि पर्वत कैलाश मानसरोवर यात्रा का सुगमतम मार्ग था। 1829 के नक्शे में लिपुलेख बिना नाम के तिब्बत को खुल रहे दर्रे के रूप में दिखाया गया। गुंजी से ऊपर कुटी नदी को काली नाम दिया है।

लिपुलेख कुमाऊं की सीमा में

1846 के नक्शे में लिपुलेख तक काली के साथ कुमाऊं की सीमा दर्शाई है। 1850 के नक्शे में ज्यादा स्पष्टता है। 1851 में रिचर्ड स्ट्रेची के लेख में छपे नक्शे में लिपुलेख के साथ सभी दर्रे हैं। 1879 के नक्शे में कालापानी से लिपुलेख के पूर्व-दक्षिण की धार का टिंकर नदी के जलागम से पहले तक भारतीय क्षेत्र में दिखाया।

1907 तथा 1931 के नक्शे में 1879 की स्थिति को ही दिखाया गया है। फिर यही क्रम बना रहा। कुमाऊं के कमिश्नर ट्रेल ने 1825 के आसपास ‘भोटिया महल’ में लिखा था कि 1790 में गोरखों की कुमाऊं विजय के बाद व्यास को जुमला शासन से मुक्ति मिली।

हेनरी स्ट्रेची ने 1846 में छांग्रू तथा टिंकर यात्रा के बाद सरकार की गलती मानी थी। यहां से ऊपर काली नदी नहीं बल्कि टिंकर, आपी और नांफा सीमा होनी चाहिए थी। सरकार ने ब्यास क्षेत्र को न्यायपूर्ण तराके से विभाजित नहीं किया। कंपनी शासन यदि जानकारी से लैस होता तो वह गर्ब्यांग तक काली और फिर टिंकर को भारत-नेपाल सीमा बनाता।

आजादी के बाद ज्यादा करीब आए

भारत की आजादी के बाद 31 जुलाई 1950 को नेपाल व भारत के बीच शांति संधि हुई। 7 नवंबर 1950 के सरदार बल्लभभाई पटेल ने जवाहरलाल नेहरू को लिखे पत्र में तिब्बत में चीन के आने के खतरों की ओर इशारा किया था।

इसके बाद 1952 में नेपाल की उत्तरी सीमा में 18 भारतीय सैनिक चेकपोस्ट स्थापित हुए, जो 1969 तक कायम रहे। भारतीय अधिकारी नेपाली जवानों को प्रशिक्षण देने नेपाल गये। त्रिभुवन हवाई अड्डे के निर्माण में भारतीय सैनिकों का योगदान रहा।

1959-60 के बाद तिब्बती दर्रों पर स्पेशल प्रोटेक्शन फोर्स तैनात की गई, जहां बाद में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस आई। 1962 में कालापानी के आसपास बंकर स्थापित हुए और सेना तैनात हुई। 1989-90 की 15 महीने की नाकेबंदी के बाद तत्कालीन पीएम वीपी सिंह और नेपाली प्रधानमंत्री केपी भट्टराई के बीच वार्ता के बाद बहुत उदारता से नेपाल की ओर मैत्री और मदद के हाथ बढ़ाये गये थे।

इसमें कालापानी प्रसंग कहीं नहीं था। 1996 के बाद यह मुद्दा उठा। नए जनतंत्र का तकाजा भी था। इसी के बाद तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच संवाद में पहली बार कालापानी मामले का जिक्र हुआ। 1996 में महाकाली संधि पर भी हस्ताक्षर हुए, जिसमें काली के विवादास्पद बने क्षेत्र का जिक्र नहीं आया।

1776 किमी लंबी सीमा

नेपाल-भारत की सीमा 1776 किमी. लंबी है। नेपाल के साथ भारत के 26 जिले सीमा बनाते हैं। 54 स्थानों पर भारत-नेपाल सीमा पर विवाद है, जिनमें से एक कालापानी-लिपुलेख है। नेपाल-भारत की खुली सीमा है, बंद या नियंत्रित नहीं।

इसके जितने उपयोगी पक्ष हैं, उससे कुछ कम हानिकारक भी। दोनों देशों ने इसे बनाये रखा है। उपमहाद्वीप में तनाव, आतंकवादी घटनाओं के बढ़ने और नेपाल में माओवादी आंदोलन के फैलने से 1990 के बाद ही इसमें कठिनाई आने लगी थी।

2015 में नए संविधान के साथ नेपाल ने नए युग में प्रवेश किया पर उसका भूगोल और समस्याएं वही पुरानी थीं। भारत और चीन की तरह नेपाल को भी एक तरह के राष्ट्रवाद की जरूरत थी और सड़क के लिपुलेख पहुंचने के साथ ही इसका विस्फोट हो गया। अभी जो नेपाल की संसद ने किया है या कुछ उत्साही सड़कों में करते दिखाई दे रहे हैं, वह इसकी पराकाष्ठा है।
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चीन ने एक तीर से किए दो शिकार

1856 में तिब्बत और नेपाल के बीच हुई संधि में नेपालियों को तिब्बत में व्यापार तथा चराई के अधिकार मिले। चीन में साम्यवादी सरकार के आने के बाद दृश्य बदला। नेपाल-चीन सीमा 1415 किमी. है, जो 15 सीमांत जिलों से लगी है।

जहां पशु चराने वाले बौद्ध समुदाय के लोग रहते हैं। यहीं वे दर्रे हैं जो व्यापार, तीर्थयात्रा तथा पशुचारण के लिए खुलते हैं। चीन ने सागरमाथा (ऐवरेस्ट) शिखर को अपना कहा था। फिर चतुराई दिखाई। 1960 में चीनी प्रधानमंत्री ने सागरमाथा को नेपाल का माना।

नेपाल-चीन सीमा समिति ने जल्दी सीमा का हल कर लिया। संधि के अनुसार, अरुण घाटी के कुछ क्षेत्र नेपाल को लौटा दिए। लेकिन नेपाल की सीमा जो तिब्बत की तरफ थी उसे चीन ने जलविभाजक धार तक ला दिया। इस तरह चीन ने एक तीर से दो शिकार करने में कामयाबी पाई।

भारत सुस्त रहा और टालता रहा। राजदूतों ने अस्पष्ट वक्तव्य दिये। सीमा विवाद संबंधी भारत नेपाल संयुक्त समिति को अधिक गंभीरता से और जल्दी इसका निदान ढूढ़ना चाहिए। वह सदियों से भारत का अभिन्न मित्र है और कई मामलों में भारत पर निर्भर है।
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