भारत सरकार के सूत्रों का कहना है कि नेपाल की संसद के निचले सदन में नए नक्शे का संशोधन पारित होने के बाद पेचीदगियां बढ़ गई हैं। 13 जून को हुए इस मतदान में सभी 258 सदस्यों ने पक्ष में मतदान किया था। अब नेपाल को चाहिए कि वह भारत के साथ सीमा के मुद्दे को सुलझाने के लिए वार्ता का माहौल बनाए।
हालांकि इस बिल पर वहां की संसद के उच्च सदन में 16 जून को मतदान होना है। नेपाल के कई बुद्धजीवी भारत के साथ तल्ख हो रहे रिश्ते को सही नहीं मान रहे हैं। नेपाल के प्रमुख अर्थशास्त्री ने भी इसे सही नहीं माना है। 16 जून को नेशनल असेंबली के उच्च सदन में सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के पास दो तिहाई का बहुमत है।
सुब्रमण्यम स्वामी ने रविवार को ट्वीट करके राजनीति, विदेश नीति, कूटनीति का पारा चढ़ा दिया था। लेकिन स्वामी का यह ट्वीट समय की चाल देखकर आया था। उन्होंने अपने ट्वीट में इस तरह की स्थिति के लिए नेपाल को दोषी नहीं ठहराया। स्वामी ने भारत की विदेश नीति को रीसेट करने की बात की है। उन्होंने साफ कहा कि सोचने वाली बात है, नेपाल ने भारत को अनसुना क्यों कर दिया? आखिर उनके पास ऐसी कौन सी मजबूरी थी।
पूर्व विदेश सचिव शशांक भी नेपाल सरकार के इस कदम को भारत के लिए अच्छा नहीं मानते। वह कहते हैं कि इसमें हमारे रणनीतिकारों की असफलता है। प्रो. एसडी मुनि भी कहते हैं कि देखते-देखते नेपाल में भारत का विरोध वहां के राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया है। भारत को इस पर ढंग से विचार करना चाहिए। अभी समय है और सही कदम उठाया जाना चाहिए।
नेपाल के आक्रामक तेवर और उसके तेवर में दिखाई दे रही चीन की छाया पर भारत सरकार का रुख भी कुछ रणनीतिकारों को नहीं समझ में आ रहा है। एक वरिष्ठ पूर्व राजनयिक का कहना है कि यह कहना ठीक नहीं है कि नेपाल वार्ता का माहौल तैयार करे। सूत्र का कहना है कि यह समय विदेश नीति में गंभीरता के साथ नई पहल का है।
एक तरफ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह नेपाल के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता बता रहे हैं और दूसरी तरफ नेपाल की तरफ से पहल होने या माहौल बनने पर बात होगी? सूत्र का कहना है कि मेरे ख्याल में इस तरह का संदेश नहीं दिया जाना चाहिए। भारत के अखबारों में जो भी प्रकाशित होता है, उसे नेपाल के लोग, वहां के भारत में पढ़ रहे तमाम छात्र ध्यान से पढ़ते हैं। इसलिए संवेदनशीलता बरते जाने की जरूरत है।