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भारत में जल्द लागू हो यूनिफॉर्म सिविल कोड: तस्लीमा नसरीन

Tue, 24 Jan 2017 05:00 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, जयपुर
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तस्लीमा नसरीन
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बांग्लादेश की विवादित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कहा है कि उनके खिलाफ फतवे जारी करने वाले को तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों का संरक्षण रहा है। उन्होंने नाम लेकर कहा कि कोलकाता में सरेआम उनके (तस्लीमा) खिलाफ फतवा जारी करने वाले और सिर पर इनाम रखने वाले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के दोस्त हैं। ऐसे लोगों को ममता, पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य एवं पूर्व कांग्रेस सरकार का समर्थन व संरक्षण मिला है। 
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उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर किस तरह की धर्म निरपेक्षता है। फतवे जारी करने वालों को बढ़ावा देना क्या धर्म निरपेक्षता है। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज की महिलाओं के अधिकारों की बात करें, तो कोई विरोध में नहीं उतरता और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात करें, तो जानलेवा हमला हो जाता है। इस्लाम को मानने वाले और इस्लामिक देश जब तक खुद के लिए आलोचना नहीं सुनेंगे, तब तक वे धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकते। उन्होंने समान नागरिक संहिता को तुरंत लागू करने की पैरवी की। उन्होंने कहा कि महिला अधिकारों के लिए ये बेहद जरूरी है।


जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पहली बार तस्लीमा नसरीन ने अंतिम दिन सोमवार को शिरकत की। विवाद होने के आशंका से उनके सत्र को अंत तक छिपाए रखा और अचानक उन्हें मंच पर बुला लिया गया। फेस्टिवल में बाहर से मंच तक भारी पुलिस बल का इंतजाम किया गया था। इस विशेष सत्र में तस्लीमा ने धर्म, कट्टरपंथियों, सरकारों, महिलाओं और खुद के निर्वासन को लेकर खुलकर बातचीत की।
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उन्होंने कहा कि जब वे हिंदू, क्रिश्चयन धर्मों के खिलाफ लिखती हूं, तो कुछ नहीं होता, लेकिन जैसे ही मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ लिखती हूं, तो मेरे खिलाफ फतवा जारी हो जाता है और जान का खतरा बन जाता है। जबकि बिना आलोचना धर्म सुधार नहीं हो सकता।

इस्लाम को भी आलोचना स्वीकार करनी चाहिए। वर्ष 2003 में मेरी पुस्तक का विरोध मुसलमानों ने नहीं किया था, बल्कि तत्कालीन मुख्यमंत्री के मित्र लेखकों ने किया और मेरा निर्वासन कर दिया गया। केवल ये लेखक मेरे विचारों से सहमत नहीं थे। जबकि लोगों को मेरी पुस्तक और मेरे विचार पसंद आए थे। फिर भी, मुझे दिल्ली में कोई मकान किराए पर देने को तैयार नहीं था।
 

ये कैसे देश, जहां अधिकार हनन करने वालों के बजाए पीड़ित ही दोषी

ट्रिपल तलाक - फोटो : social media
उन्होंने कहा कि वे मानवता, समानता, लिखने-बोलने की आजादी पर विश्वास रखती हैं, न कि धर्म व राष्ट्रवाद पर। वे ऐसे देशों की सीमाओं के भी खिलाफ हैं, जो धर्म के आधार पर बनी हुई हों। उन्होंने बांग्लादेश और भारत के लिए कहा कि ये कैसे धर्मनिरपेक्ष देश हैं, जिन्होंने मेरे अधिकारों का हनन करने वालों को सजा तक नहीं दी और पीड़ित होने के बावजूद मैने निर्वासन की पीड़ा झेली। हैदराबाद में हमला होने पर मुझे ही दोषी ठहराया गया।


विजन हो तो छोटे शहर वाले भी बना सकते हैं फिल्मी कॅरियर
लेखक-निदेशक इम्तियाज अली और सुधीर मिश्रा का मानना है कि विजन हो तो छोटे शहरों से आने वाले भी फिल्मी कॅरियर बना सकते हैं। कहानी सभी के पास है, लेकिन फर्क यह है कि कोई अपनी कहानी को किस अंदाज में कहता है। उन्होंने कहा कि वे भी छोटे शहर से आए इस कारण उनके आम जीवन से जुड़े काफी अनुभव थे। उन्होंने कहा कि ये जरूरी नहीं कि इस इंडस्ट्री में सभी को सभी तरह के अनुभव और ज्ञान हो।

उन्होंने कहा कि वे जब वी मेट बनाने से पहले कभी पंजाब नहीं गए। मदर इंडिया: इंडियन फिल्म्स एंड द नेशनल नरेटीवस सत्र में दोनों ने कहा कि लोग रोमांटिक हैं, इसलिए सिनेमा में रोमांस दिखाया जाता है। सिनेमा का पूरे समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सिनेमा महंगा होता है, फिल्म बनाने में कई लोगों की मेहनत लगती है। फिल्म नहीं चले, तो काफी नुकसान होता है। हालांकि सभी बड़ी ऑडियंस के लिए फिल्में बनाते हैं।
 
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हर धर्म महिलाओं के खिलाफ

- फोटो : Reuters
उन्होंने कहा कि हर धर्म महिलाओं के अधिकारों का हनन करता है। लेकिन जब महिला अधिकारों की बात होती है, तो वे सुधार भी करते हैं और समझते भी हैं। लेकिन इस्लाम में महिला अधिकारों की बात नहीं की जाती, इसे समझना होगा। उन्होंने सवाल उठाए कि इस्लाम में महिलाओं को अधिकार क्यों नहीं मिलते? उनके अधिकारों के लिए आवाज क्यों नहीं उठाती? ये सब नहीं है, तो कोई राष्ट्र खुद को धर्मनिरपेक्ष कैसे कह सकता है? उन्होंने कहा कि महिलाओं की सभी समस्याओं के समाधान के उपाय शिक्षा है। उन्होंने कहा कि असहिष्णुता हर क्षेत्र में है, चाहे वह घरेलू हिंसा हो या महिला अत्याचार। उन्होंने सवाल उठाया कि हिंदुस्तान में मुस्लिम महिलाओं को बराबर का हक नहीं दिया जा रहा, फिर लोकतंत्र की क्यों बातें होती हैं?

मुस्लिम संगठनों ने किया तस्लीमा का विरोध
जेएलएफ में तस्लीमा का विरोध भी हुआ। हालांकि जब तक सत्र पूरा हो चुका था। सत्र के दौरान सूचना फैसले से मुस्लिम संगठनों ने प्रवेश द्वार पर नारेबाजी की। उनके विरोध को देखते हुए बड़ी संख्या में पुलिस बल मौके पर पहुंच गया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि साहित्य उत्सव में तस्लीमा को नहीं बुलाना चहिए था।

हिंदू—मुस्लिम सद्भाव को तोड़ा है राजनीति ने
बीईंग द अदर में पत्रकार और लेखक सईद नकवी ने कहा कि भारत की सभ्यता और संस्कृति में हिंदू और मुसलमान दोनों हिस्सा रहे हैं, लेकिन राजनीति ने इनके सद्भाव को समाप्त करने का काम किया है। भारत के मुसलमानों को नई दिल्ली—श्रीनगर, हिंदू—मुसलमान और भारत पाकिस्तान के त्रिकोणीय जाल में फंसा दिया गया है। मुसलमान यहां की स्थानीय रीति रिवाजों से जुडे़ है। उन्हें अपनी धार्मिक क्रियाएं भी यहां के रीति रिवाजों के अनुसार करनी होती है। लेखिका सादिया देहलवी ने कहा कि इस्लाम की मूल अवधारणा को कट्टरपंथी हाइजेक कर रहे हैं। पूरे देश में गंगा जमुनी संस्कृति देखी जा सकती है।
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