अंतरिक्ष के अतीत का निरीक्षण करने के लिए भारत अन्य देशों के सहयोग से एक खास टेलीस्कोप बनाने जा रहा है। 30 मीटर व्यास के इस टेलीस्कोप के जरिये हम दस अरब प्रकाश वर्ष की दूरी तक का अध्ययन कर सकेंगे। यानी अंतरिक्ष से जो प्रकाश दस अरब साल में हम तक पहुंचता है, उतनी दूरी तक इस टेलीस्कोप से देख सकते हैं। उतनी दूरी पर घटने वाली क्रियाओं का सूक्ष्म अध्ययन कर सकते हैं और अंतरिक्ष ज्ञान के क्षेत्र में भविष्य में ये हमारी खास उपलब्धि होगी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में चार दिन के प्रवास पर आए प्रो. जयंत विष्णु नार्लीकर ने शनिवार को बातचीत में जानकारी साझा की।
बताया कि इस टेलीस्कोप को बनाने में भारत के साथ अमेरिका, जापान, चीन और यूरोप के कुछ देश सहयोग कर रहे हैं। इसलिए कि इतना बड़ा टेलीस्कोप बनाने का खर्च अमेरिका जैसा देश भी अकेले वहन नहीं कर सकता। इस काम में भारत की दस प्रतिशत साझेदारी है। एक अनुमान के अनुसार साल में करीब 200 रात ही अंतरिक्ष में घट रही चीजों के अध्ययन के लिए उपयुक्त होती हैं। ऐसे में दस प्रतिशत की साझेदारी के मुताबिक इस टेलीस्कोप से भारत 20 रातों का अध्ययन कर सकेगा लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है कि उन 20 रातों के अध्ययन के लिए हमारे पास विशिष्ट अंतरिक्ष वैज्ञानिक हों। युवाओं को हमें इस ओर आकर्षित करना होगा।
बताया कि अब तक सबसे अधिक 11 मीटर व्यास का टेलीस्कोप दुनिया में है जो कि दक्षिण अफ्रीका के पास है। इसे बनाने में भी भारत का सहयोग रहा है। इस टेलीस्कोप से हम एक अरब प्रकाश वर्ष तक का अध्ययन कर पा रहे हैं। कहा कि हमें नई तकनीकी का इस्तेमाल कर कुशल व उच्चस्तरीय उपकरण बनाने पर ज्यादा से ज्यादा जोर देना होगा। बताया कि नंदे महाराष्ट्र में लाइगो टाइप डिटेक्टर बनाने की तैयारी चल रही है। इससे ब्रह्मांड के गुरुत्व के क्षणों का चित्रण हमें पता लग सकेगा। दो ब्लैक होल आपस में टकराने, महा विस्फोट के बाद निकलने वाली रेडिएशन का भी इससे अध्ययन हो सकेगा।