दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन को दूर करने की कोशिश पांच साल पहले भी हुई थी। 2014 में जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने कारोबारी सहयोग बढ़ाने के लिए पांच वर्षीय विकास कार्यक्रम बनाया था। तब इस मुद्दे पर प्रमुखता से बात हुई थी कि कैसे भारत अपने सामान की चीन के बाजारों में पहुंच बनाए। पिछले साल दोनों देशों के बीच तय हुआ था कि भारत गैर बासमती चावल, मछली और मछली के तेल जैसे कुछ उत्पाद चीन को निर्यात करेगा।
चीनी बाजारों में बनानी होगी ज्यादा पहुंच
चीन के बाजारों में ज्यादा से ज्यादा भारतीय उत्पादों की पहुंच से असंतुलन को दूर किया जा सकता है। भारत ने इसको लेकर चीन से बात की है। भारत चीन में दवाइयां, चावल, चीनी, फल, सब्जियां, मांस उत्पाद, सूती धागा और कपड़ा निर्यात कर सकता है। इसके अलावा आईटी और इंजीनियरिंग की सेवाएं भी दे सकता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी ट्रेड वॉर का असर
अमेरिका के साथ चीन की ट्रेड वार का असर भारत समेत पूरी दुनिया पर पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 2019-20 वित्तीय वर्ष में दुनिया के 90 फीसदी हिस्से में आर्थिक सुस्ती की बात कही है। जिसकी प्रमुख वजहों में से ट्रेड वॉर भी है।
निर्यातकों के प्रमुख संगठन फियो ने कहा कि पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अनौपचारिक बैठक दोनों देशों के बीच व्यापार सहित अन्य मुद्दे सुलझाने की दिशा में बेहतर संकेत है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाइजेशन (फियो) के अध्यक्ष शरद कुमार ने कहा, दो देशों के बीच मतभेद होना आश्चर्यजनक बात नहीं है। भारत का व्यापार घाटा चिंता का विषय है। दूसरी बड़ी चिंता बाजार पहुंच है, जो भारतीय निर्यात की राह में बाधा है। इससे भारतीय निर्यात अपनी वास्तविक क्षमता को हासिल नहीं कर पा रहे हैं।
भारत से डेयरी, सोयाबीन उत्पादों समेत फलों की पहुंच चीन के बाजार तक नहीं है। भारतीय दवाइयों के लिए भी चीन में निर्यात करना मुश्किल है क्योंकि पंजीकरण में काफी समय लगता है। कुमार ने भारत में चीन के नागरिकों के लिये पांच साल का विविध प्रवेश सुविध वीजा का स्वागत किया है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि चीन भी इसी तरह की सुविधा भारतीयों के लिये उपलब्ध करायेगा जिससे की पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।