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सफलता: भारत में सस्ते और सुपरकैपेसिटर बनाने का रास्ता साफ, शोधकर्ताओं ने विकसित की नई तकनीक

Wed, 07 May 2025 06:50 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

सुपरकैपेसिटर ऊर्जा भंडारण की अगली पीढ़ी के उपकरण माने जाते हैं। ये पारंपरिक लिथियम-आयन बैटरियों की तुलना में न केवल अधिक ऊर्जा स्टोर कर सकते हैं, बल्कि इन्हें बेहद कम समय में चार्ज भी किया जा सकता है। इससे इलेक्ट्रिक वाहनों, ग्रिड-स्टोरेज सिस्टम और पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इनकी उपयोगिता तेजी से बढ़ रही है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : freepik
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विस्तार
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भारत ने स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा की दिशा में एक बड़ी छलांग लगाई है। नागालैंड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक टीम ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है जिससे सुपरकैपेसिटर के लिए बेहद किफायती और प्रभावी सामग्री का निर्माण संभव हुआ है। नई तकनीक पारंपरिक बैटरियों की क्षमता को पीछे छोड़ सकती है।

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सुपरकैपेसिटर ऊर्जा भंडारण की अगली पीढ़ी के उपकरण माने जाते हैं। ये पारंपरिक लिथियम-आयन बैटरियों की तुलना में न केवल अधिक ऊर्जा स्टोर कर सकते हैं, बल्कि इन्हें बेहद कम समय में चार्ज भी किया जा सकता है। इससे इलेक्ट्रिक वाहनों, ग्रिड-स्टोरेज सिस्टम और पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इनकी उपयोगिता तेजी से बढ़ रही है। अब तक सुपरकैपेसिटर बनाने में इस्तेमाल महंगी और जटिल सामग्री, एक बड़ी चुनौती थी जिससे इनका बड़े पैमाने पर व्यावसायीकरण बाधित हो रहा था। इस चुनौती का समाधान अब भारतीय वैज्ञानिकों ने खोज निकाला है। उन्होंने एक आसान और किफायती तरीका विकसित किया है, जिससे एमिनेटेड ग्रेफीन नामक विशेष सामग्री को तैयार किया जा सकता है। इसमें उत्कृष्ट इलेक्ट्रोकेमिकल गुण पाए जाते हैं। इससे बने सुपरकैपेसिटर ऊर्जा को तेजी से स्टोर और रिलीज करने में सक्षम होते हैं, जो विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों और स्मार्ट ग्रिड के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकता है। प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर दीपक सिन्हा के अनुसार नई तकनीक से बनाए गए सुपरकैपेसिटर लंबे समय  तक उपयोग में लाने योग्य और टिकाऊ हैं। यह तकनीक पारंपरिक सामग्री की तुलना में पांच गुना अधिक ऊर्जा संग्रहित कर सकती है।
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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान
इस शोध के परिणाम प्रतिष्ठित जर्नल आई साइंस में प्रकाशित हुए हैं। इसका नेतृत्व डीएसटी-इंस्पायर फेलो सूरज कुमार ने किया, जिनका मार्गदर्शन नागालैंड विश्वविद्यालय के प्रो. दीपक सिन्हा और विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के प्रो. दिनेश रंगप्पा ने किया। शोध दल में प्रियाक्षी बोरा, कुनाल रॉय व डॉ. नव्या रानी भी शामिल थीं। यह खोज भारत के उस संकल्प को मजबूती देती है जिसमें देश को स्वच्छ, आत्मनिर्भर व पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा समाधानों की ओर ले जाने की बात कही गई है।

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