प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन 2.0 की घोषणा कर दी है। कोविड-19 का संक्रमण रोकने की रणनीति बनाने में लगे लोगों के अनुसार सरकार के पास लॉकडाउन को ढाल बनाने के सिवा कोई चारा नहीं है, क्योंकि अभी भारत के पास कोविड-19 की जांच, संक्रमण की पहचान, लोगों का इलाज करने और चिकित्सकों-नर्सों व अन्य स्टाफ की उचित सुरक्षा के पूरे इंतजाम नहीं हो पाए हैं।
फार्मास्युटिकल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन दिनेश दुआ का कहना है कि भारत को वेंटिलेटर, मास्क, सर्जिकल मास्क, पीपीई किट, गॉगल, रैपिड टेस्टिंग किट, डायग्नोस्टिक किट के निर्यातक देश केवल चीन, हांगकांग हैं। बाकी देशों के हाथ पहले से बंधे हैं।
अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली सभी को अपने लिए ही संसाधनों की जरूरत है। बताते हैं चिकित्सा के कुछ उपकरण और संसाधन भारत हांगकांग के रास्ते से ले आया था, लेकिन हुए करार का बहुत सा भाग आना बाकी है। वहीं चीन में भारत के राजदूत विवेक मिसरी के अनुसार भारत ने चीन को डेढ़ करोड़ पीपीई किट, मास्क, गॉगल का आर्डर दिया है।
दिनेश दुआ वैक्सीन बनाने की जानी-मानी कंपनी के मालिक भी है। दुआ का कहना है कि टेस्टेड रैपिड टेस्टिंग किट भी चीन से ही आनी है। तीन दिन पहले आईसीएमआर ने रैपिड टेस्टिंग किट को अपनी मंजूरी दी है। इसमें संक्रमण की संभावना वाले व्यक्ति का ब्लड डालते ही मलेरिया समेत अन्य संक्रमण की तरह 15 मिनट में पता चल जाता है।
रैपिड टेस्टिंग किट बनाने के लिए कोविड-19 से संक्रमित व्यक्ति के शरीर से एंटी-बॉडी लेना पड़ती है। यह चीन के सिवा अभी कौन कर सकेगा? मुझे लग रहा है कि हमने आर्डर दे दिया है और इसे आने में एक दो सप्ताह का समय लगेगा।
पीसीआर तकनीक आधारित रीएजेंट आधारित जांच मंहगी है। इसमें छह सात घंटे लगते हैं। इस जांच को हम बड़ी संख्या में नहीं कर सकते। इसलिए अभी जो हमारे पास चीन से आई या कुछ अन्य जांच किट, स्क्रीनिंग प्रणाली है, उसका ही उपयोग कर रहे हैं।
देश की कंपनियां भी अभी टेस्टिंग किट की आपू्र्ति करने का दावा कर रही हैं, लेकिन जब सरकार और जांच में लगी प्रयोगशालाओं को मिलने लगे, तभी कुछ कह सकते हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट का हवाला देने पर चुप्पी साध लेते हैं। दिल्ली में कोविड-19 से निबटने की समिति में शामिल एक चिकित्साधिकारी ने भी माना कि अभी सही तरीके से जांच नहीं हो रही है। हम केवल लॉकडाउन के सहारे चल रहे हैं।
फार्मास्युटिकल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन दिनेश दुआ का कहना है कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश प्रतिदिन 10 हजार से एक लाख लोगों तक की जांच कर रहे हैं। इनकी तुलना में भारत का आंकड़ा दस लाख में 149 लोगों की जांच पर ही टिका है।
सच पूछिए तो अभी हम जांच कर ही नहीं रहे हैं। जो रिपोर्टिंग केस या संक्रमितों की जानकारी आ रही है, उन्ही की जांच हो रही है। इस मामले में हम केवल लॉकडाउन के भरोसे चल रहे हैं। क्योंकि हमारे पास जांच, इलाज के साधन अभी तक नहीं हो पाए। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग ही सहारा है।
दिनेश दुआ का कहना है कि मास्क बनाना, इंपोर्ट करना या इसके लिए परेशान होना ठीक नहीं है। अभी देश में 130 करोड़ लोग हैं और सबको मास्क देना संभव नहीं है। इसलिए लोग मास्क घरों में बना रहे हैं। अच्छा है कि लोग रुमाल या तौलिया को साफ करके मास्क की तरह इस्तेमाल करें, वही अच्छा है।
भारत सैनिटाइजर को नहीं झेल सकता। इसलिए लोग साबुन से हाथ धोएं। यह सब केवल डाक्टरों के लिए रहने दें। रहा सवाल पीपीई किट का तो महाराष्ट्र के पास केवल दो दिन की किट बची है। चेन्नई जैसे राज्यों ने कुछ पहले मंगा लिया था।
लेकिन सरकार को चाहिए कि प्लास्टिक मोल्डिंग कंपनियों को इसे बनाने की अनुमति दे दे। लॉकडाउन में उन्हें छूट दें। दिक्कत यह है कि हमने इसे आवश्यक सामानों की सूची में नहीं डाला है। इसलिए परेशानी बढ़ रही है।
दूसरा, हमारे यहां पसर्नल प्रोटेक्शन किट को दोबारा से प्रयोग करने के इंतजाम नहीं हैं। प्रतिदिन इन्हें धोने, सैनिटाइज करने और फिर से उपयोग लायक बनाने की सुविधा भी अभी हमारे पास नहीं है। इसीलिए इसकी कमी और अखर रही है।
दिनेश दुआ ने कहा कि लॉकडाउन 2.0 भारत की मजबूरी है। हमारे पास संसाधन नहीं है, इसलिए लोगों की सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखकर संक्रमण को रोकना ही सबसे उपयुक्त चारा है। हालांकि इसके चलते हमारी अर्थव्यस्था पर बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
देश के बड़े-बड़े उद्योग घराने तंग हैं। एमएसएमई की स्थिति बेहद चिंता जनक है। दरअसल हमने पहले सोचा नहीं था कि कभी इस तरह की महामारी आएगी। दूसरे, अभी चिकित्सीय, उपकरण, संसाधन आने में समय लगेगा।