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विश्व अर्थव्यवस्था में मजबूत भूमिका निभा रहा है भारत: ईयू से एफटीए, देश की वैश्विक आर्थिक भूमिका को नई मजबूती

Sat, 31 Jan 2026 04:18 AM IST
शुभम कुमार नवनीत सहगल पूर्व अध्यक्ष, प्रसार भारती

सार

पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डालने वाली शक्ति बन चुका है। विविध साझेदारियों, भरोसेमंद समझौतों से भारत ने साबित किया है कि वह स्थिर विकास व अंतरराष्ट्रीय विश्वास दोनों को साथ लेकर चल सकता है।
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भारत-ईयू के बीच समझौते - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के बाद भारत वैश्विक निर्यात के मोर्चे पर कहीं अधिक मजबूत स्थिति में है। यह समझौता भारत को अपने 2 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात लक्ष्य की ओर न सिर्फ तेजी से बढ़ने का अवसर देगा, बल्कि भारत की हिस्सेदारी को वैश्विक वैल्यू चेन में और गहराई से जोड़ेगा। इंजीनियरिंग और तकनीकी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में भारत पहले से ही यूरोपीय आयात में अहम स्थान रखता है। इस समझौते के बाद यह हिस्सेदारी और बढ़ेगी।
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भारत-ईयू एफटीए देश की आर्थिक कूटनीति में अहम मोड़ है। हाल में भारत ने कई देशों के साथ आधुनिक और संतुलित व्यापार समझौते किए हैं और यूरोपीय संघ के साथ यह करार उन सभी प्रयासों को मजबूत ढांचे में जोड़ता है। दुनिया के सबसे बड़े और सबसे सख्त मानकों वाले बाजार के साथ समझौता यह दिखाता है कि भारत अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र में अपनी जगह बना चुका है।

पीएम के सकारात्मक संवाद से अटकलों पर विराम
इस समझौते के पीछे भारत की बदली हुई वैश्विक रणनीति है, जिसमें आर्थिक हित और कूटनीतिक संतुलन है। पीएम नरेंद्र मोदी की विदेश और व्यापार नीति को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जहां किसी एक शक्ति केंद्र पर निर्भर हुए बिना भारत ने अपनी आर्थिक पहुंच को सुनियोजित तरीके से आधी दुनिया तक फैलाया है।
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तमाम अटकलों व नैरेटिव के बावजूद अमेरिका के साथ रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी पर सकारात्मक संवाद बनाए रखते हुए, समानांतर रूप से यूरोप, पश्चिम एशिया, एशिया-प्रशांत और अन्य प्रमुख आर्थिक क्षेत्रों के साथ व्यापार समझौते कर भारत ने साफ कर दिया है कि वह किसी गुट का अनुयायी नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेने वाला आत्मविश्वासी वैश्विक खिलाड़ी है। ऐसे दौर में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन की चुनौतियों से जूझ रही है, यह समझौता भारत के लिए स्थिरता और भरोसे का मजबूत आधार तैयार करता है।

ट्रेड पॉलिसी और राष्ट्रीय विकास की रणनीति में तालमेल
इस समझौते का सीधा संबंध विकसित भारत के लक्ष्य से भी जुड़ता है। यह देश को बड़े मैन्युफैक्चरिंग व एक्सपोर्ट हब के रूप में आगे बढ़ाने की सोच का ठोस आधार तैयार करता है। ट्रेड पॉलिसी और राष्ट्रीय विकास की रणनीति, दोनों के बीच साफ तालमेल दिखाई देता है। इसी व्यापक असर के चलते भारत-ईयू एफटीए को मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है।

भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए नए अवसर 
इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग गुड्स, ऑटो कंपोनेंट्स और केमिकल्स जैसे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए भी यह समझौता यूरोपीय वैल्यू चेन से गहराई से जुड़ने का अवसर देगा। फार्मा सेक्टर में जहां टैरिफ पहले से कम हैं, वहां असली फायदा नियमों में सहयोग और गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने से मिलेगा। आईटी, डिजिटल और फाइनेंशियल सेवा प्रतिबद्धताओं और प्रोफेशनल मोबिलिटी से जुड़े प्रावधानों से भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए यूरोप में काम के नए मौके खुलेंगे।

यूरोपीय देशों तक पहुंच
भारत का लगभग 80% निर्यात यूरोप के सिर्फ छह देशों तक सीमित है। इस समझौते के बाद छोटे, लेकिन तेजी से उभरते यूरोपीय देशों में भी भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ने की उम्मीद है। भारत के पास तेज विकास, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और डिजिटल स्किल्स हैं, जबकि यूरोप उन्नत तकनीक, पूंजी और उच्च-मूल्य बाजार उपलब्ध कराता है। यानी, दोनों स्वाभाविक, लेकिन भरोसेमंद साझेदार हैं। यह समझौता भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर सुनियोजित निराशावादी विमर्श खड़ा करने की कोशिशों को भी ध्वस्त करता है।

भारत और यूरोपीय संघ मिलकर करीब दो अरब लोगों का बाजार बनाते हैं और वैश्विक आबादी के लगभग एक-चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक तरफ भारत यूरोपीय कंपनियों के लिए तेजी से बढ़ता उपभोक्ता बाजार है, तो दूसरी ओर भारतीय निर्यातकों को दुनिया के सबसे बड़े आयात बाजारों में से एक तक बेहतर पहुंच मिलेगी।

ईयू बाहरी देशों से वस्तुओं में लगभग 2.6 ट्रिलियन डॉलर व सेवाओं में करीब 1.5 ट्रिलियन डॉलर का आयात करता है। इसमें भारत की हिस्सेदारी 3% से भी कम रही है। यह समझौता इसी अंतर को कम करने और बड़े पैमाने पर निर्यात बढ़ाने का रास्ता खोलता है। वस्त्र, परिधान, चमड़ा और फुटवियर जैसे क्षेत्र यूरोप में 9-12% तक के शुल्क का सामना कर रहे थे। अब शुल्क-मुक्त पहुंच से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी आैर उत्पादन व रोजगार को सहारा मिलेगा।
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