हैदराबाद स्थित सीएसआईआर-सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के वैज्ञानिक ब्लॉकचेन फॉर इम्पैक्ट (बीएफआई) के सहयोग से पारंपरिक जानवरों पर जांच को कम कर इन-विट्रो (प्रयोगशाला आधारित) तकनीक विकसित करना शुरू किया है। यह तकनीक विष के अलग-अलग टॉक्सिन्स पर एंटी वेनम की असरकारक क्षमता को प्रयोगशाला में ही माप सकती है, जिससे जीवित जानवरों पर परीक्षण की जरूरत 50% तक कम हो जाएगी।
भारत सर्प विषरोधी दवा की गुणवत्ता परखने के लिए ऐसी प्रयोगशाला आधारित तकनीक विकसित कर रहा है, जिससे हजारों जीवों की जान बच सकेगी।
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हैदराबाद स्थित सीएसआईआर-सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के वैज्ञानिक ब्लॉकचेन फॉर इम्पैक्ट (बीएफआई) के सहयोग से पारंपरिक जानवरों पर जांच को कम कर इन-विट्रो (प्रयोगशाला आधारित) तकनीक विकसित करना शुरू किया है। यह तकनीक विष के अलग-अलग टॉक्सिन्स पर एंटी वेनम की असरकारक क्षमता को प्रयोगशाला में ही माप सकती है, जिससे जीवित जानवरों पर परीक्षण की जरूरत 50% तक कम हो जाएगी। दरअसल, भारत में बनने वाले सर्प विषरोधी इंजेक्शन की गुणवत्ता जांचने के लिए एक ईडी 50 नामक जांच की जाती है, जिसके लिए हर उत्पादन फैक्टरी में करीब 3,700 चूहों का इस्तेमाल होता है। सीसीएमबी के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. कार्तिकेयन वासुदेवन और ब्लॉकचेन फॉर इम्पैक्ट (बीएफआई) के सीईओ डॉ. गौरव सिंह का कहना है कि यह खोज लागत और जानवर दोनों को बचाने के लिए है।
लागत और सर्प विष की खपत में आएगी कमी
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस नई तकनीक से एंटीवेनम उत्पादन की लागत में करीब 30% कमी आने का अनुमान है। यही नहीं, परीक्षण में कम मात्रा में विष की जरूरत होगी जिससे सांपों से बार-बार विष निकालने की प्रक्रिया भी घटेगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण कदम होगा।
वैश्विक मानक बनाने की क्षमता
विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले से ही इन-विट्रो टेस्टिंग को अपनाने की सिफारिश कर रहा है लेकिन दुनिया के ज्यादातर देशों में इसे पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर भारत में यह प्रयोग सफल रहा तो इसे वैश्विक मानक बनाया जा सकता है।