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Climate Change: विकसित देशों का दोहरा रवैया, जीवाशम ईंधन को लेकर विकासशील राष्ट्रों पर दबाव डालना गलत

Fri, 29 Sep 2023 11:46 PM IST
जलज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

भारत ने जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) में एक प्रतिवेदन सौंपा है, जिसमें उसने बताया कि आखिर य ग्लोबल स्टॉकटेक को लेकर उसकी अपेक्षाएं क्या हैं। इसमें ही भारत ने कहा है कि विकसित देश पेरिस समझौते के अनुच्छेद 2.1 (सी) को अलग-थलग करके देखते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
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विस्तार
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भारत ने जीवाश्म ईंधन को लेकर अमीर देशों के दोहरे रवैये पर गहरी नाराजगी जताई है। भारत का कहना है कि विकसित देश खुद तो जीवाश्म ईंधन में निवेश कर रहे हैं, ने के लेकिन विकासशील देशों में इसके विकास को प्रतिबंधित करने के लिए पेरिस समझौते के एक नियम का इस्तेमाल कर रहे हैं। गरीब देशों पर इस तरह दबाव बनाना कतई अनुचित है।
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भारत ने जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) में एक प्रतिवेदन सौंपा है, जिसमें उसने बताया कि आखिर य ग्लोबल स्टॉकटेक को लेकर उसकी अपेक्षाएं क्या हैं। इसमें ही भारत ने कहा है कि विकसित देश पेरिस समझौते के अनुच्छेद 2.1 (सी) को अलग-थलग करके देखते हैं। यही नहीं, विकासशील देशों को धन उपलब्ध कराने की अपनी प्रतिबद्धताओं से किनारा करने के लिए जलवायु वित्त पर अन्य प्रावधानों की भी अनदेखी कर रहे हैं।

दरअसल, अनुच्छेद 2.1 (सी) कहता है कि वित्त प्रवाह ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन घटाने और जलवायु- अनुकूल विकास का समर्थन करने वाला होना चाहिए। भारत का कहना है कि कुछ विकसित देशों ने इसे एक आदर्श मानक बना लिया है और अन्य महत्वपूर्ण जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पर्याप्त धन मुहैया नहीं करा रहे हैं। भारत का कहना है कि यह स्थिति अस्वीकार्य है, क्योंकि इससे विकासशील देशों को जलवायु वित्त जुटाने में मदद के विकसित देशों के दायित्व गंभीर रूप से कमजोर होते हैं।
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भारत की दलील में दम
क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क इंटरनेशनल में ग्लोबल पॉलिसी लीड इंद्रजीत बोस ने बताया कि भारत की दलील में दम है। वित्त प्रवाह को सुसंगत बनाए जाने की बेहद जरूरत है, क्योंकि अतिरिक्त वित्त उपलब्ध होने पर ही विकासशील देश जलवायु अनुकूल विकास पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे। पेरिस समझौते का अनुच्छेद 9.1 पर विकसित देशों को विकासशील देशों के वित्तपोषण के निर्देशित करता है।

प्रगति और चूक की मिलती है जानकारी
ग्लोबल स्टॉकटेक सूचनाएं जुटाने, तकनीकी आकलन करने और फिर उस पर मंथन के जरिये यह निष्कर्ष निकालने की प्रक्रिया है कि विभिन्न देशों और हितधारकों ने पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में कितनी प्रगति की है और कहां चूक हो रही है। दो साल तक चलने वाली यह प्रक्रिया इस साल के अंत में दुबई में कॉप-28 के दौरान पूरी होगी।

कॉप-28 में हितधारकों को साथ लाने की होगी कोशिश
ग्लोबल स्टॉकटेक के लिए जारी विचार-विमर्श के बीच संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने कॉप-28 के आयोजन की तैयारियां तेज कर दी हैं। जलवायु परिवर्तन पर कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज यानी कॉप-28 का आयोजन यूएई की एक्सपो सिटी दुबई में इसी साल 30 नवंबर से 12 दिसंबर के बीच होगा। यूएई के राजदूत अब्दुलनासर ने बताया कि उनके देश की तरफ से एक गोलमेज कांफ्रेंस का आयोजन इसी संदर्भ में किया गया। यूएई की अध्यक्षता में कॉप-28 में यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जाएगी कि दुनिया जलवायु परिवर्तन पर स्पष्ट, सामूहिक, सहयोगात्मक और समावेशी कार्ययोजना के साथ आगे बढ़े।

व्यापार-निवेश में बाधक नहीं बनना चाहिए जलवायु एजेंडा
भारत ने हाल में बिसबेक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की एक बैठक के दौरान जलवायु एजेंडे को लेकर आगाह किया कि इसका इस्तेमाल ऐसे कदम उठाने में नहीं किया जाना चाहिए जो व्यापार और निवेश में बाधक हों। 27 सितंबर को हाईब्रिड मोड में आयोजित एससीओ की मंत्रिस्तरीय 22वीं बैठक में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने सदस्य देशों के बीच व्यापार और आर्थिक सहयोग बढ़ने के उपायों पर चर्चा की। उन्होंने बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के मूल सिद्धांतों और लक्ष्यों की सुरक्षा के साथ ही पर्यावरण सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और जैव विविधता के संरक्षण के महत्वपूर्ण क्षेत्रों सहित कई प्रमुख समस्याओं पर भी प्रकाश डाला। 

ग्लोबल स्टॉकटेक से ये हैं अपेक्षाएं डॉलर
भारत चाहता है कि पहले ग्लोबल स्टॉकटेक निष्कर्षो में कार्बन उत्सर्जन में 2020 से पहले एंड का अंतर पाटा जाए और समानता के अभाव को गंभीर चिंता माना जाए। यही नहीं, इसमें इस बात के ब को भी प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन से निपटने को लेकर विकसित देशों में गंभीर इच्छाशक्ति का अभाव है। विकसित देशों को अपनी जिम्मेदारियों के अनुरूप उत्सर्जन घटाने और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा क्षमता निर्माण में विकासशील देशों के समर्थन के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
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