रेजांग-ला क्या है?
रेजांग-ला लद्दाख के चुशूल सेक्टर में स्थिति एक पर्वतीय दर्रा है। सामरिक रूप से बेहद अहम इस दर्रे का भारत के सैन्य इतिहास में अत्यंत अहम स्थान है। 1962 के भारत-चीन युद्ध में यहीं पर भारतीय सैनिकों ने मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में अदम्य साहस का प्रदर्शन किया था। समुद्रतल से 16 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह दर्रा सर्दियों में बर्फ के शिखरों से पूरी तरह घिर जाता है। सर्दियों में यहां का तापमान माइनस -25 डिग्री तक चला जाता है।
18 नवंबर 1962 को क्या हुआ था?
1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान 18 नवंबर 1962 के दिन लड़ी गई रेज़ांग-ला की लड़ाई विश्व सैन्य इतिहास की सबसे वीरतापूर्ण सैन्य लड़ाइयों में से एक मानी जाती है। आइये उस दिन की पूरी कहानी को जानते हैं। 18 नवंबर 1962 की वो रात बेहद सर्द थी। पारा -25 के करीब पहुंच चुका था। भारत सेना लद्दाख को बचाने के लिए रेजांग-ला पर तैनात की गई। क्योंकि, अगर चीन इस दुर्गम दर्रे के पार करने में सफल रहता तो वो पूरे लद्दाख पर अपना नियंत्रण बना लेता। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 13 कुमाऊं बटालियन की एक कंपनी को यहां तैनात किया गया। इस बटालियन में अधितर सैनिक हरियाणा से थे, जिन्होंने जिदंगी में पहले कभी बर्फ नहीं देखी थी। इन सैनिकों पर भीषण सर्दी में युद्ध करने का कोई प्रशिक्षण नहीं था। न ही इस सर्दी से निपटने के लिए कोई खास कपड़े थे। इतना ही नहीं इन सैनिकों पर जो हथियार थे वो भी अत्याधुनिक नहीं थे। रात करीब तीन साढ़े तीन बजे का वक्त था। तभी पूरा पहाड़ी इलाका शोर से गूंज गया, ये आवाज थी चीनी टैंकों की। सामने से चीनी सैनिंक रेजांग-ला पर चढ़ते चले आ रहे थे। भारतीय जवानों ने जवाबी फायर किया, एक-एक कर वहां तैनात हर प्लाटून से ये खबर आने लगी उनकी ओर सैकड़ों की संख्या में चीनी सैनिक आ रहे हैं। चीनीं सैनिकों की कुल संख्या 3000 से ज्यादा की थी। जबकि, दूसरी तरफ भारतीय सेना के महज 120 जवान मोर्चा ले रहे थे। मेजर शैतान सिंह ने आदेश दिया कि जैसे ही चीनी फायरिंग रेंज में आएं, उन पर फायरिंग शुरू कर दी जाए। भारतीय जवानों ने चीनियों पर एलएमली, एलएमजी और मोर्टार से हमला करना शुरू कर दिया।
अत्यधिक संख्या में कम होने और 16,000 फीट की ऊंचाई पर तैनात होने के बावजूद भारतीय सैनिकों ने असाधारण साहस और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया। उन्होंने चीनी सेना को भारी क्षति पहुंचाई, हालांकि अंततः वे चारों ओर से घिर गए और वीरगति को प्राप्त हुए। इस भीषण संघर्ष में 114 भारतीय जवनों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। इन वीर सैनिकों ने चीन के 1300 से ज्यादा जवानों को मार गिराया था और तीन हजार से अधिक चीनी सैनिकों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।
उनके प्रबल प्रतिरोध ने चीनी सेना की अग्रिम पक्ति को काफी देर तक रोके रखा और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चुशूल सेक्टर की रक्षा में अहम भूमिका निभाई। यह लड़ाई भले ही दुखद रही हो, लेकिन यह भारतीय सेना की अदम्य भावना, दृढ़ता और देशभक्ति का अद्वितीय प्रतीक बन गई। मेजर शैतान सिंह के असाधारण नेतृत्व के लिए उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र, भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान, प्रदान किया गया। इसी बटालियन के आठ अन्य जवानों को वीर चक्र, चार को सेना मेडल व एक को मैंशन इन डिस्पेच का भी सम्मान प्रदान किया गया था। रेजांग-ला की लड़ाई की विरासत आज भी पीढ़ियों को प्रेरित करती है, और यह संदेश देती है कि भारत के सैनिक अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटते।
आंते तक बाहर आ गईं, फिर भी लड़ते रहे
भीषण युद्ध के दौरान मेजर शैतान सिंह की बांह में 'शेल' का एक टुकड़ा लग गया। इसके बाद भी पट्टी करवा कर अपने सैनिकों का नेतृत्व करना जारी रखा था। लड़ाई भीषण होती जा रही थी, इस बीच उनके पेट पर एक पूरा 'बर्स्ट' आकर लगा। बहुत ज्यादा खून बह जाने के कारण मेजर शैतान सिंह अत्यधिक बार-बार बेहोशी की हालत में चले जा रहे थे। इस युद्ध का हिस्सा रहे ऑनरेरी कैप्टन सूबेदार राम चंद्र यादव ने एक इंटरव्यू में बताया है कि घायल मेजर शैतान सिंह ने उसने अपने पेट में बहुत दर्द होने की बात कहकर उकी बेल्ट खोलने के लिए कहा। जब सूबादर राम चंद्र ने मेजर शैतान सिंह की कमीज में हाथ डाला तो उनकी सारी आंतें बाहर आ गई थीं। यह देखकर उन्होंने मेजर शैतान सिंह की बेल्ट नहीं खोली, क्योंकि अगर वो ऐसा करते तो सब कुछ बाहर आ जाता।
इसी इंटरव्यू में सूबेदार रामचंद्र यादव ने बताया है कि टूटती सांसों से मेजर शैतान सिंह ने कहा था कि मेरा एक कहना मान लो। तुम बटालियन में चले जाओ और सब को बताओ कि कंपनी इस तरह लड़ी है। मैं यहीं मरना चाहता हूं।