कश्मीर के गांदरबल जिले में श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे तैनात सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) का एक जवान।
- फोटो : PTI
गलवां घाटी में खूनी झड़प के बाद भारत-चीन के बीच तनाव चरम पर है। 20 जांबाजों को गंवाने से देश गुस्से में है। ऐसे में अमर उजाला ने सामरिक मामलों के विशेषज्ञों से जानना चाहा कि भारत को अब क्या करना चाहिए? इस घटना का सेना के मनोबल पर क्या असर पड़ेगा? चीन ने तनाव के लिए यही समय क्यों चुना? पेश हैं विशेषज्ञों के जवाब...
रिटायर्ड जनरल बिक्रम सिंह
चीन को कड़ा संदेश दिए बिना बात नहीं बनेगी। उसे सख्त संदेश जाना चाहिए कि भारत रत्तीभर भी उसके दबाव में नहीं आएगा। चीन ने जिस प्रकार एलएसी की दूसरी तरफ सैन्य जमावड़ा बढ़ाया है, उससे हमें सतर्क रहने की जरूरत है।
वह भविष्य में एलएसी पर तनाव कायम रखने के लिए कई नए तरीके अपना सकता है। जहां तक हिंसक झड़प के बाद सेना के मनोबल पर असर पड़ने की बात है, तो इसकी रत्तीभर भी संभावना नहीं है। जहां तक तनाव पर सरकार की चुप्पी का सवाल है, तो मैं इस पर टिप्पणी नहीं करूंगा।
सरकार मामले से जुड़े सभी पक्षों से लगातार संपर्क में है। चीन ने देखा कि भारत कोविड-19 और आर्थिक चुनौतियों में व्यस्त है। उसने मौके का फायदा उठाया। चीन के शीर्ष नेतृत्व की सहमति के बगैर संभव नहीं है। चीन ने इसकी पूरी तैयारी की थी।
इसलिए यह नहीं माना जा सकता है कि एलएसी पर दोनों देशों की सेनाओं के बीच होने वाली झड़प ने अचानक हिंसक रूप ले लिया। आर्थिक मोर्चे पर अपने ही घर में घिरा चीन लोगों का आर्थिक दुश्वारियों से ध्यान हटाने और वैश्विक मंच पर अपने खिलाफ भारत की भूमिका को पचा नहीं पा रहा। वह भारत पर दबाव बनाना चाहता है।
कश्मीर के गांदरबल जिले में श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे तैनात सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवान।
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चीन के इतिहास को देखते हुए बेहद सतर्क रहने की जरूरत है। शीर्ष स्तर पर कूटनीतिक पहल होनी चाहिए। ऐसे समय में एलएसी पर खास मुस्तैदी जरूरी है, क्योंकि चीन का इतिहास शांतिपूर्ण समाधान की दलील के बीच पीठ में छुरा घोंपने की रही है।
गलवां घाटी में खूनी झड़प के बाद देश को अपनी सेना पर भरोसा रखने की जरूरत है। देश को विश्वास होना चाहिए कि हमारी सेना किसी भी स्थिति का सामना करने में सक्षम है। जहां तक सरकार पर चुप्पी की बात है तो मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। मामला बेहद संवदेनशील है।
सरकार परिपक्व ढंग से कदम बढ़ा रही है। जरूरी नहीं कि हर बार बढ़-चढ़ कर बयान दिया जाए। खुद चीन उदाहरण है। उसे भी नुकसान हुआ, मगर वह चुप है। चीन ने भारत की मौजूदा स्थिति का लाभ उठाया। पूरा देश कोरोना के मोर्चे पर उलझा है।
उसने भारत को नेपाल के साथ भी उलझा दिया। जहां तक गलवां में खूनी झड़प की बात है, तो मुझे नहीं लगता कि यह शीर्ष नेतृत्व के इशारे पर हुआ। पूरी संभावना है कि झड़प स्थानीय कमांडर के निर्देश पर हुई। जब सेना आमने-सामने होती है तो ऐसी घटनाएं होने की आशंका रहती हैं। कई बार स्थितियां काबू से बाहर हो जाती हैं।
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल दीपेंद्र हुड्डा
सबसे पहले एलएसी पर तनाव कम करने और इसके बाद शीर्ष कूटनीतिक पहल के जरिए समाधान की पहल होनी चाहिए। दोनों देश पहले एलएसी पर पुराने प्रोटोकॉल पर सहमत होें, फिर विवाद के निपटारे के लिए शीर्ष स्तर बातचीत शुरू हो। लेकिन चीन के इतिहास को देखते हुए सेना को बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।
मेरा मानना है कि गलवां में हुए खूनी झड़प का सेना के मनोबल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। क्योंकि यह आमने सामने का युद्ध नहीं बल्कि चीनी सेना का घात लगा कर किया गया हमला है। युद्ध में बुरी हार से मनोबल गिरता है। मेरी समझ में दो महीने से एलएसी पर तनाव के बावजूद सरकार की चुप्पी अनुचित है।
इससे बेवजह ही एक संशय पैदा होता है। चीन कई मोर्चों पर भारत से खार खाए बैठा है। दक्षिण चीन सागर, व्यापारिक समझौते, अपने खिलाफ वैश्विक गोलबंदी में भारत की भूमिका से चीन नाराज है। चूंकि भारत इस समय कोरोना महामारी में बुरी तरह उलझा है।
देश की अर्थव्यवस्था पर भी बेहद प्रतिकूल असर पड़ा है। इसलिए चीन ने इसी समय को तनाव बढ़ाने के लिए चुना। गलवां घाटी में खूनी झड़प को सेना के बीच स्थानीय स्तर का टकराव मानना बेवकूफी होगी। चीन का लंबे समय से एलएसी पर सामरिक महत्व के इलाकों पर नजर रही है।
रिटायर्ड मेजर जनरल अशोक मेहता
एलएसी पर तनाव की अभूतपूर्व स्थिति को टालने के लिए सैन्य स्तर की बातचीत परिपक्व कदम नहीं था। जब मामला बड़ा हो तो बड़ी कूटनीतिक पहल की जरूरत होती है। अब पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति में बात होनी चाहिए। इससे पहले भारत अपने पुराने रुख पर डटे रहने का संदेश दे। देश की सेना मानसिक रूप से बेहद दृढ़ है।
ऐसे में किसी को यह मानने की भूल नहीं करनी चाहिए कि इस घटना से सेना बैकफुट पर आ गई होगी। हमारी सेना को पता है कि देश के शहादत देना उसके कर्तव्य का एक हिस्सा है। पूरे मामले में सरकार की चुप्पी निराशाजनक है।
दो महीने के बाद सरकार को सर्वदलीय बैठक बुलाने की याद आई। जबकि ऐसे मौके पर पहले ही सर्वदलीय बैठक बुलाकर एकजुटता का संदेश देना चाहिए था। चीन नहीं चाहता कि एलएसी पर भारत उसे बराबरी का टक्कर दे। वह एलएसी पर भारत के निर्माण कार्यों से झल्लाया है।
चीन की कोशिश भारत को दबाव में ले कर निर्माण कार्यों पर रोक लगाने की है। कोरोना व अर्थव्यवस्था के मोर्चो पर भारत के फंसा होने को उसने अपने लिए मौका देखा और घटना को अंजाम दे दिया। इसमें किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं होना चाहिए कि गलवां में जो हुआ उसमें चीनी नेतृत्व की सहमति नहीं थी।