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15 जून की रात... गलवां घाटी में भारतीय सेना ने बायोनट फाइट से चीनी खेमे में मचाई थी तबाही

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Sun, 19 Jul 2020 02:55 AM IST

सार

15 जून की रात बिहार रेजिमेंट ने कर्नल समेत जवानों की शहादत का लिया था बदला
सेना की सिचुएशन रिपोर्ट में उस रात का ब्योरा, चीन के बनाए बांध टूटने का भी जिक्र 
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भारतीय सेना (फाइल फोटो)

पूर्वी लद्दाख के गलवां घाटी में 15 जून को चीनी सैनिकों के साथ हिंसक झड़प में कर्नल समेत दो जवानों की शहादत का बदला बिहार रेजीमेंट ने उसी रात ले लिया था। कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष बाबू की मौत से आहत जवानों ने चीनी खेमे में ऐसी तबाही मचाई, जिसे चीन आज भी स्वीकार करने से कतराता है। इसमें गलवां में तैनात आर्टिलरी रेजीमेंट के सिख जवानों ने भी गजब का शौर्य दिखाया।

गलवां में हुई हिंसक झड़प पर तैयार सिचुएशन रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी सैनिकों के नुकीले डंडों के हमले में संतोष बाबू और जवानों के शहीद होने के बाद बिहार रेजीमेंट के जवानों ने करीब 200 मीटर दूर बेस से बंदूकें लेकर नली पर संगीन लगाया। रात के अंधेरे में करीब 40 जवान रेजीमेंट के वार क्राई ‘जय बजरंग बली’ और ‘बिरसा मुंडा’ की जय बोलते हुए चीनी खेमे पर धावा बोल दिया। सूत्रों के मुताबिक, अंधेरे में अचानक हुए बायोनट फाइट (संगीन से लड़ाई) हमले में चीनी सैनिक जमीन पकड़ने लगे। हालांकि कुछ देर में चीनियों की तरफ से जवाबी हमले हुए लेकिन तब तक भारतीय सैनिक अपना काम कर चुके थे।



आर्टिलरी रेजीमेंट के सिख सैनिकों कई चीनी सैनिकों की गर्दन तोड़ डाली। इस झड़प में भारतीय जवानों को भी गंभीर चोटें आईं, जिसमें 18 जवानों की मौत हुई। अंधेरे और आपाधापी में चीनी जवानों की मौत की संख्या का सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सका। सूत्रों ने बताया, जवानों ने उस रात दुश्मन के दांत खट्टे करने के बाद चीनी सेना के सीओ दो अन्य अधिकारियों को बंदी बनाकर ले आए थे। उधर, चीनी सेना ने कुछ भारतीय अधिकारियों को बंदी बना लिया था। कुछ दिन बाद इन्हीं चीनी अधिकारियों के बदले भारतीय जवानों को छोड़ा गया।

बांध टूटने से उखड़े चीनी टेंट...

 

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भारतीय सेना (फाइल फोटो)
पूर्वी लद्दाख के गलवां घाटी में 15 जून को चीनी सैनिकों के साथ हिंसक झड़प में कर्नल समेत दो जवानों की शहादत का बदला बिहार रेजीमेंट ने उसी रात ले लिया था। कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष बाबू की मौत से आहत जवानों ने चीनी खेमे में ऐसी तबाही मचाई, जिसे चीन आज भी स्वीकार करने से कतराता है। इसमें गलवां में तैनात आर्टिलरी रेजीमेंट के सिख जवानों ने भी गजब का शौर्य दिखाया।

गलवां में हुई हिंसक झड़प पर तैयार सिचुएशन रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी सैनिकों के नुकीले डंडों के हमले में संतोष बाबू और जवानों के शहीद होने के बाद बिहार रेजीमेंट के जवानों ने करीब 200 मीटर दूर बेस से बंदूकें लेकर नली पर संगीन लगाया। रात के अंधेरे में करीब 40 जवान रेजीमेंट के वार क्राई ‘जय बजरंग बली’ और ‘बिरसा मुंडा’ की जय बोलते हुए चीनी खेमे पर धावा बोल दिया। सूत्रों के मुताबिक, अंधेरे में अचानक हुए बायोनट फाइट (संगीन से लड़ाई) हमले में चीनी सैनिक जमीन पकड़ने लगे। हालांकि कुछ देर में चीनियों की तरफ से जवाबी हमले हुए लेकिन तब तक भारतीय सैनिक अपना काम कर चुके थे।

आर्टिलरी रेजीमेंट के सिख सैनिकों कई चीनी सैनिकों की गर्दन तोड़ डाली। इस झड़प में भारतीय जवानों को भी गंभीर चोटें आईं, जिसमें 18 जवानों की मौत हुई। अंधेरे और आपाधापी में चीनी जवानों की मौत की संख्या का सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सका। सूत्रों ने बताया, जवानों ने उस रात दुश्मन के दांत खट्टे करने के बाद चीनी सेना के सीओ दो अन्य अधिकारियों को बंदी बनाकर ले आए थे। उधर, चीनी सेना ने कुछ भारतीय अधिकारियों को बंदी बना लिया था। कुछ दिन बाद इन्हीं चीनी अधिकारियों के बदले भारतीय जवानों को छोड़ा गया।

बांध टूटने से उखड़े चीनी टेंट...

 

सूत्रों के मुताबिक, रिपोर्ट में बताया गया कि चीन ने गलवां नदी पर एक छोटा बांध बना रखा था। उस रात वह बांध अचानक टूटा और पानी की मोटी धार चीनी खेमे की तरफ बह गई। माना जा रहा है कि इसमें चीन के कई टेंट और सैनिक मारे गए थे।

अगली सुबह कई घायल भारतीय सैनिक भी गलवां नदी के आसपास मिले जो ठंड की वजह से गंभीर हालात में थे। यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान की तस्दीक करता है जिसमें उन्होंने गलवां वारदात के बारे में बताते हुए कहा था कि हमारे जवान दुश्मनों को मारते मारते शहीद हुए हैं।

गोली नहीं...चाकू तो चला सकते हैं

भारत और चीन के बीच हुए सीमा प्रबंधन करार के मुताबिक, वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर दोनों पक्ष हथियार लेकर आमने सामने नहीं होते। 15 जून को ऐसा ही था जब कर्नल बाबू अपने कुछ जवानों के साथ बिना हथियार बात करने गए थे।

चीनियों के पास भी हथियार नहीं थे लेकिन वह बांस और बल्ले में कांटेदार तार लपेटे  हुए साजो सामान से लैंस थे। इसी से कर्नल संतोष बाबू के सिर पर हमला किया गया जिसमें वह शहीद हो गए। सूत्रों ने बताया  कि इस घटना के बाद तैनात बिहार रेजीमेंट ने फैसला लिया कि यहां गोली नहीं चलाई जा सकती लेकिन चाकू तो चलाया जा सकता है।
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