वर्ष 2015 में पेरिस समझौते के दौरान दुनिया के शीर्ष देशों ने पृथ्वी का तापमान दो डिग्री सेल्सियस तक कम करने के लिए कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने का फैसला किया था। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र के एजेंडा 2030 के अंतर्गत कार्य करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। लेकिन विशेषज्ञों को उम्मीद है कि भारत कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने का अपना लक्ष्य अगले दो से तीन वर्षों के अंदर ही पूरा कर लेगा। यह उपलब्धि हासिल करने वाला भारत दुनिया का पहला देश होगा। भारत की इस उपलब्धि को विशेष कहा जा सकता है क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के विकसित देश भी इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं।
तय लक्ष्य के अनुसार भारत को मानक वर्ष 2005 में हो रहे कुल कार्बन उत्सर्जन में 32-35 फीसदी की कटौती करनी थी। भारत इस लक्ष्य में 22 फीसदी से अधिक की कटौती कर चुका है। देश में जिस तरह सौर ऊर्जा उपकरणों और इलेक्ट्रॉनिक वाहनों का उपयोग बढ़ रहा है, विशेषज्ञों को उम्मीद है कि भारत अगले दो वर्षों के अंदर शेष लक्ष्य को हासिल कर पेरिस समझौते पर अमल करने वाला दुुनिया का पहला देश बन जाएगा। किसी भी देश के कुल ऊर्जा उत्पादन में नॉन फॉसिल फ्यूल की मात्रा बढ़ाकर 40 फीसदी तक करने का भी लक्ष्य निर्धारित किया गया था। देश में सौर ऊर्जा उपकरणों, वायु एनर्जी, हाइड्रोपावर जैसे संसाधनों का दोहन बढ़ने से भी इस लक्ष्य को प्राप्त करने की तरफ तेजी से बढ़ा जा रहा है।
द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) के डायरेक्टर जनरल डॉ. अजय माथुर ने अमर उजाला को बताया कि सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन में बढ़ोतरी होने, सौर ऊर्जा उपकरणों के प्रति सरकारों का प्रोत्साहन देने वाला नजरिया देश को स्वच्छ ईंधन के उपयोग में बढ़ोतरी देने वाला साबित हो रहा है। लोग भी ऊर्जा बचत करने वाले उपकरणों के उपयोग को पसंद कर रहे हैं। यही कारण है कि भारत आसानी से इस लक्ष्य को प्राप्त करने की तरफ बढ़ रहा है।
भारत धीरे-धीरे विकास कर रहा है। इसे अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अभी भी संसाधनों का निर्माण करना है। इन जरूरतों के लिए भारत सरकार अभी से नॉन-फॉसिल ईंधनों जैसे सौर ऊर्जा, वायु ऊर्जा और हाइड्रोएनर्जी पर आधारित संसाधनों का निर्माण कर रही है। यही कारण है कि इस मामले में भारत बेहतर स्थिति में है।
सौर ऊर्जा केंद्रों से उत्पन्न बिजली भारत के लिए सस्ती भी पड़ रही है जो उसके लिए अतिरिक्त लाभ का कारण है। विशेषज्ञों के मुताबिक कोयले से उत्पन्न बिजली भारत में न्यूनतम 3.5 रुपये से 4 रुपये प्रति यूनिट पड़ रही है, जो उपभोक्ताओं तक पहुंचने में 7.50 रुपये से 8 रुपये प्रति यूनिट तक हो जाती है। जबकि सौर ऊर्जा से उत्पन्न स्वच्छ बिजली मात्र 2.40 रुपये प्रति यूनिट की ही पड़ रही है। भारत जैसे देश के लिए यह भारी राशि है।
जबकि विकसित देशों में वर्तमान में ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक ढांचा विकसित किया जा चुका है। अगर वे अपने पुराने संसाधनों को हटाकर नए नवीकरणीय संसाधन लगाते हैं तो उसकी कीमत बहुत ज्यादा होगी जो उनके लक्ष्य को बाधित करता है। हालांकि यूरोपीय यूनियन ने कोयले-तेल आधारित ऊर्जा केंद्रों को हटाने और उनके स्थान पर नवीकरणीय ऊर्जा ढांचे को विकसित करने के लिए आवश्यक आर्थिक सहयोग देने की योजना पर सहमति दे दी है।
कोयला आधारित बिजली उत्पादन केंद्रों की तुलना में नवीकरणीय ऊर्जा केंद्रों में लगभग दो गुना ज्यादा रोजगार पैदा होते हैं। इस प्रकार भारत जैसे देश में जहां सरकार के सामने करोड़ों लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने की चुनौती सामने रहती है, यह बेहद कारगर साबित हो सकती है।
यहां यह ध्यान रखने योग्य बात है कि कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में अकुशल श्रमिकों के लिए कोयले की खुदाई इत्यादि कार्यों के जरिए ज्यादा रोजगार उपलब्ध होते हैं, जबकि सौर ऊर्जा जैसे बिजली संयंत्रों में कुशल कारीगरों के लिए कार्य उपलब्ध होते हैं।