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Independence day Special: बिस्मिल-अशफाक की दोस्ती का किस्सा, शायरी से हुई पहली मुलाकात मौत के साथ खत्म

Tue, 11 Aug 2020 02:20 PM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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अशफाकुल्ला खान और राम प्रसाद बिस्मिल
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देशवासी 15 अगस्त को आजादी की 74वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं। बाकी समारोहों और त्योहारों की तरह देश का 74वां स्वतंत्रता दिवस भी करोना वायरस के प्रकोप के साए में ही मनाया जाएगा। इस बीच हम आपको देशभक्ति की मिसाल पेश करने वाले दो शहीदों की दोस्ती का एक किस्सा बता रहे हैं.. जिसपर हर देशवासी को नाज है।

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देश की आजादी के लिए शहीद हुए राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्लाह खां की शहादत आज भी सबसे जेहन में है। दोनों एक-दूसरे को जान से भी ज्यादा चाहते थे।दोनों ने जान दे दी, पर एक-दूसरे को कभी धोखा नहीं दिया। राम प्रसाद बिस्मिल के नाम के आगे पंडित जुड़ा था। वहीं अशफाक मुस्लिम थे, वो भी पंजवक्ता नमाजी। पर इस बात का कोई फर्क दोनों पर नहीं पड़ता था। क्योंकि दोनों के ऊपर मजहब से भी बड़ा देशभक्ति का नशा छाया हुआ था, दोनों का मकसद एक ही था। आजाद मुल्क... वो भी मजहब या किसी और आधार पर हिस्सों में बंटा हुआ नहीं, पूरा का पूरा। इनकी दोस्ती की मिसाल आज भी दी जाती है।


ऐसे शुरू हुई थी दोनों की दोस्ती
अशफाक 22 अक्टूबर 1900 को यूनाइटेड प्रांत यानी आज के उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में पैदा हुए थे। अशफाक अपने चार भाइयों में सबसे छोटे थे और किशोरावस्था में उभरते हुए शायर के तौर पर पहचाने जाते थे। लेकिन घर में जब भी शायरी की बात चलती, उनके एक बड़े भाई अपने साथ पढ़ने वाले राम प्रसाद बिस्मिल का जिक्र करना नहीं भूलते। इस तरह से किस्से सुन-सुनकर अशफाक, रामप्रसाद के चहेते बन गए थे। तभी राम प्रसाद बिस्मिल का नाम अंग्रेज सरकार के खिलाफ की गई एक साजिश में आया। अशफाक भी अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराने का सपना देखते थे। इस पर बिस्मिल से मिलने की अशफाक की इच्छा और बढ़ गई। अशफाक ने ठान लिया कि राम प्रसाद से मिलना है तो मिलना है। 
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उस वक्त हिंदुस्तान में गांधी जी का असहयोग आंदोलन अपने जोरों पर था। शाहजहांपुर में एक मीटिंग में भाषण देने बिस्मिल आए। अशफाक को ये पता चला तो मिलने पहुंच गए। जैसे ही कार्यक्रम खत्म हुआ अशफाक लपककर बिस्मिल से मिले और उनको अपना परिचय उनके एक दोस्त के छोटे भाई के रूप में दिया। फिर बताया कि मैं ‘वारसी’ और ‘हसरत’ के नाम से शायरी करता हूं। इस पर बिस्मिल की दिलचस्पी अशफाक में बढ़ी। बिस्मिल उनको अपने साथ ले आए और उनके कुछ शेर सुने, वे उनको पसंद आए। फिर दोनों साथ दिखने लगे। 

जब भीड़ के सामने दीवार बन गए थे अशफाक
राम प्रसाद बिस्मिल अशफाकुल्लाह को अपना छोटा भाई मानते थे। उसी तरह अशफाक भी उन्हें बड़े भाई का ही दर्जा देते थे। आमतौर पर दोनों की मुलाकात आर्यसमाज के मंदिर में होती थी। अशफाक के आर्यसमाज मंदिर जाने पर उनके परिवार को आपत्ति थी, हालांकि अशफाक अपनी जान से प्यारे भाई से मिलने के लिए वहां जाने से कैसे रुकने वाले थे। ये सिलसिला लंबे वक्त तक चलता रहा।

बताते हैं कि एक बार मुस्लिम समाज से जुड़े दर्जनों लोग आर्यसमाज के मंदिर में रामप्रसाद बिस्मिल को मारने पहुंच गए थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि बिस्मिल ने अशफाक को बरगलाया है। जब यह घटना हुई उस वक्त अशफाक भी वहां मौजूद थे। उन्हें जब इसका पता लगा तो वह मंदिर के मुख्य द्वार पर किसी दीवार की तरह खड़े हो गए। काफी मजबूत कदकाठी के अशफाक को देखकर भीड़ बाहर ही ठिठक गई। इस दौरान उन्होंने कहा कि बिस्मिल को हाथ लगाने से पहले सभी को उनसे निपटना होगा। अशफाक के तीखे तेवरों को देखते हुए भीड़ को लौटने को मजबूर होना पड़ा था।

गांधी से निराश होकर उठा ली थी बंदूकें
साल 1922 में चौरीचौरा कांड के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का फैसला किया तो कई युवाओं को उनके इस कदम से निराशा हुई। उनमें रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक भी थे। गांधी से मोहभंग होने के बाद दोनों युवा क्रांतिकारी पार्टी में शामिल हो गए। इनका मानना था कि मांगने से स्वतंत्रता मिलने वाली नहीं है। इसके लिए हमें लड़ना होगा। पर लड़ने के लिए बम, बंदूकों और हथियारों की जरूरत थी। 
 

ये बात क्रांतिकारियों के दिमाग में चल ही रही थी कि एक रोज रामप्रसाद बिस्मिल ने शाहजहांपुर से लखनऊ की ओर सफर के दौरान ध्यान दिया कि स्टेशन मास्टर पैसों का थैला गार्ड को देता है, जिसे वो ले जाकर लखनऊ के स्टेशन अधीक्षक को देता है। बिस्मिल ने तय कर लिया कि इस पैसे को लूटना है। यहीं से काकोरी लूट की नींव पड़ी। 

शाहजहांपुर में आठ अगस्त को सारी योजना बनी। इसके बाद अगले दिन यानी नौ अगस्त को ही ट्रेन लूटने की बात तय की गई। नौ अगस्त को बिस्मिल और अशफाक के साथ आठ और लोगों ने मिलकर ट्रेन लूट ली। सारे क्रांतिकारियों का नेतृत्व रामप्रसाद बिस्मिल कर रहे थे। बिस्मिल और अशफाक के अलावा इस लूट में और लोग भी शामिल थे।


इस कांड ने अंग्रेजों की नींव हिलाकर रख दी थी। इसके बाद देशभर में क्रांति की एक अलख जग गई थी। राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्लाह खां को 19 दिसंबर 1927 को काकोरी कांड सहित अन्य मामलों में दोषी मानते हुए ब्रिटिश हुकुमत ने फांसी दे दी थी। दोनों वीर शहीद हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए और देश को आजादी का मतलब सिखा गए।

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