दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर जिस तरह से हजारों पुलिसकर्मी अपने साथ न्याय करने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, वैसा ही दिल्ली में एक बड़ा आंदोलन 70 के दशक में भी देखने को मिला था। दिल्ली के झाडोदा कला में बने ट्रेनिंग सेंटर पर सीआरपीएफ के हजारों कर्मियों ने कई सप्ताह तक एक ऐसा ही आंदोलन किया था।
जवान अपने हथियार लेकर प्रदर्शन में पहुंच गए थे। हालात जब काबू से बाहर होने लगे तो सरकार को आर्मी बुलानी पड़ी। हल्की झड़प के दौरान कई जवानों को चोट लगी। मामला शांत होने के बाद सीआरपीएफ के अनेक कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई हुई। दर्जनों सस्पेंड हुए, तो कई के खिलाफ विभागीय जांच बैठा दी गई।
सीआरपीएफ के एक पूर्व अधिकारी के मुताबिक, वो सत्तर का दशक था। उन दिनों वर्दी को लेकर जवानों में अपने अफसरों के प्रति भारी नाराजगी थी। जवानों और अफसरों को अलग-अलग तरह की वर्दी मिलती थी। अफसरों की वर्दी टेरिकोट के कपड़े की होती थी। वह आसानी से धुल जाती और प्रेस हो जाती थी। वहीं, जवानों को अपनी वर्दी धोने के लिए चावल के मांड का इस्तेमाल करना पड़ता था।
वे धोबी के पास जाते तो वह बोलता था कि अभी समय नहीं है। अगर जवान खुद अपनी वर्दी तैयार करता, तो उसमें कई घंटे लग जाते थे। पहले चावल उबालो और फिर उसका मांड निकालकर वर्दी को उसमें डाल दो, इस चक्कर में वे ड्यूटी पर लेट हो जाते थे और उन्हें सजा मिलती थी। दूसरी तरफ अगर वे बिना मांड की वर्दी अगर परेड या किसी अन्य ड्यूटी पर पहन कर जाते तो अफसर उनके खिलाफ कार्रवाई कर देते थे। इससे जवान परेशान हो गए। उन्होंने अफसरों के सामने मांग रखी कि सीआरपीएफ के सभी जवानों को भी टेरीकोट की वर्दी दी जाए।
अफसरों ने जब उनकी बात नहीं सुनी, तो वे आंदोलन पर चले गए। धीरे-धीरे यही आंदोलन उग्र रूप धारण कर गया। यह आंदोलन कई दिनों तक चलता रहा। जवानों ने आंदोलन के दौरान जब हथियार लाने शुरू कर दिए, तो सरकार की नींद टूटी। आंदोलन को शांत करने के लिए सेना को बुलाना पड़ा। उसके बाद दिल्ली में यह पहला मौका है, जब पुलिसकर्मी आंदोलन कर रहे हैं।