अपने नरेन्द्र भाई वाडा प्रधान हैं। करीब-करीब पूरे गुजरात में इस वाक्य को पूरी आत्मीयता के साथ सुना जा सकता है। अब तक के हुए सर्वे भी बताते हैं कि जनता राज्य सरकार से चाहे जितना नाराज हो लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई दामोदर दास मोदी अपनी लोकप्रियता के मामले में टॉप पर हैं। कांग्रेस के कई दिग्गज नेता भी मानते हैं कि गुजरात में नरेन्द्र भाई के कांटे बोना इतना आसान नहीं है। वड़ौदा से हरेश मलानी भी कहते हैं कि कांटे की टक्कर है, लेकिन नतीजे के बारे में अभी कुछ नहीं कह सकते।
कांग्रेस की आईटी सेल से जुड़े रोहन गुप्ता बहुत कुछ कहते-कहते अचानक रुक जाते हैं। वहीं भाजपा के नेताओं को भीतर अपने नेतृत्व पर पूरा भरोसा साफ झलकता है। पीएम के साथ गुजरात में काफी लंबे समय तक काम कर चुके केन्द्र सरकार के एक नौकरशाह के अनुसार अभी इंतजार किए। वह नरेन्द्र भाई हैं। पहले सबका खेल देखते हैं और अंत में चाल चलकर पूरी बाजी समेट लेते हैं।
सूत्र का कहना है कि गुजरात में 2002, 2007, 2012 का विधानसभा चुनाव अपने चेहरे लड़ा और इसको मत भूलिए कि तीनों में मोदी भाई ने कहीं पीठ नहीं दिखाई। दिल्ली के गुजरात भवन में तैनात एक अन्य प्रमुख सूत्र के अनुसार देखते जाइए। अभी तो प्रधानमंत्री मोदी ने अपना प्रचार ही शुरू नहीं किया है।
क्या है पीएम मोदी की ताकत
पीएम नरेंद्र मोदी
गुजरात में तीन बार चुनाव जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वहां की जड़ों तक फैले हुए हैं। गुजरात के लोग पूर्ण रुप से कारोबारी मिजाज के शांत प्रिय लोग हैं। उतने ही धार्मिक भी हैं। मठ, मंदिरों, संत, समाज में गहरी आस्था रखते हैं। चाहे मोटा भाई कथा वाचक रमेश भाई ओझा हों या मोरारी बापू। स्वामीनारायण मंदिर ट्रस्ट हो या अन्य सब पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गहरी पकड़ है।
वह करीब-करीब हर जिले, कस्बे, तालुका के प्रभावशाली लोगों से भली भांति परिचित हैं। 51 प्रतिशत की सबसे अधिक आबादी वाले ओबीसी समुदाय में वह अच्छा प्रभाव रखते हैं। पिछले तीन चुनाव तक पाटीदारों ने उनका साथ दिया है। जमकर भाजपा के पक्ष में प्रचार किया है और बूथ स्तर के प्रबंधन में भूमिका निभाकर आक्रामक भूमिका निभाई है। ओबीसी में कोली समुदाय के प्रभावी लोगों पर भी प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत पकड़ काफी अच्छी है। कोली गुजरात में 20 प्रतिशत के करीब हैं।
हिन्दुत्व के एजेंडे पर चुनाव
गुजरात विधानसभा का चुनाव हिन्दुत्व के एजेंडे की तरफ बढ़ रहा है। कांग्रेस को अभी भी अपने उस शातिर नेता की तलाश है जिसने बुधवार को सोमनाथ मंदिर उसके मीडिया विभाग के सचिव मनोज त्यागी द्वारा दर्ज कराई गई इंट्री को बिना समय गंवाए वायरल करा दिया। पार्टी को इसमें एक गहरी साजिश की बू आ रही है। इस घटना के बाद से भाजपा कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को लगातार हिन्दुत्व के एजेंडे पर घसीट रही है।
इसके बरअक्स कांग्रेस केन्द्र सरकार के कामकाज, जातिगत समीकरण, विकास के मुद्दे पर भाजपा से दो-दो हाथ करना चाहती है। राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय मुद्दे और विकास की हवा में गुजरात के तमाम स्थानीय मुद्दों का फिलहाल कोई अता-पता नहीं है। इन सबके बीच कांग्रेस को भाजपा के हिन्दुत्व का एजेंडा लगातार सता रहा है।
रोहन गुप्ता को सोमनाथ मंदिर जैसी किसी घटना के होने की आशंका काफी पहले से है। शक्ति सिंह गोहिल, अशोक गहलोत, भरत सिंह सोलंकी, अर्जुन मोढवढिय़ा और यहां तक कि अहमद पटेल इस तरह की किसी भी चूक से बचने के लिए उच्चस्तर की सतर्कता बरत रहे थे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी इसके लिए निजी स्तर पर कई बार पार्टी के नेताओं को चेताया था। कांग्रेस पार्टी के अंदरुनी सूत्र भी मान रहे हैं अभी सोमनाथ मंदिर से बजी खतरे की घंटी कानों में गूंज रही है। इसका खतरा थमा नहीं है।
रविवार को प्रधानमंत्री स्वामी नारायण मंदिर जाने वाले हैं। राहुल गांधी हर रोज पूजा-अर्चना के साथ चुनाव प्रचार पर निकल रहे हैं। गुजरात के करीब 22 से अधिक मंदिरों में मत्था टेक चुके हैं। 4 दिसंबर को पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए नामांकन करने के बाद राहुल गांधी फिर गुजरात के दौरे पर हैं। हिन्दुत्व के एजेंडे को धार देने के लिए उ.प्र. के मुख्यमंत्री समेत तमाम नेता इस दौरान गुजरात में ही होंगे। माना यह जा रहा है कि 9 दिसंबर को होने वाले मतदान के पहले चरण को ध्यान में रखकर इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी अपनी आखिरी पहल कर सकते हैं।
राजनीति से दूर पर ....
पीएम मोदी
रमेश भाई ओझा, मोरारी बापू, स्वामी नारायण मंदिर समेत तमाम मठ, धार्मिक संस्थाएं गुजरात में अच्छा प्रभाव रखती हैं। कारोबार, व्यापार में व्यस्त लोगों के मानसिक तनाव से मुक्ति, मेडिटेशन में प्रभावी हैं। शराब, नशा अथवा व्यसन से लोगों को दूर रखने में सहायक हैं।
आम तौर पर इस तरह का धार्मिक समाज राजनीति से दूर रहता है, लेकिन रमेश भाई ओझा ने पिछले कुछ कथा वाचन के दौरान जिस तरह से जीएसटी, नोटबंदी को लेकर कहा है और जैसे वह परोक्ष रुप से ही सही अपनी बात कह रहे हैं, उसका असर पड़ सकता है। मोरारी बापू ने भी जीएसटी को थोड़े समय का संकट बताते हुए बाद में सबकुछ ठीक होने की बात कही है। इन सबके माने निकाले जा रहे हैं। माना जा रहा है कि इस तरह की तमाम अपील अब जनता के बीच में आ सकती हैं।
अंडरकरेंट भी है
राजनीति में चुनाव के दौरान अंडरकरंट शब्द काफी प्रयोग में लाया जाता है। इसे सरलतम भाषा में राख के नीचे दबी आग कह सकते हैं। गुजरात के चुनाव में कुछ ऐसे भी अंडरकरंट हैं, जो जनता के बीच में हैं। इनमें से कोई एक प्रभावी होने पर राज्य विधानसभा चुनाव का नतीजा अपना रंग दिखा देगा। - 18-30 साल के युवाओं ने जब से होश संभाला है राज्य में केवल भाजपा का शासन देखा है। इन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान गुजरात की शासन व्यवस्था की ही जानकारी है।
ऐसा वर्ग हमेशा नव प्रयोगवादी, आक्रामक, प्रतिक्रियावादी होता है और कांग्रेस या विपक्ष को अजमाने का उत्साह दिखा सकता है। ऐसा हुआ तो कांग्रेस बड़ी बाजी जीत सकती है। हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, अल्पेश ठाकोर समेत अन्य युवाओं का गुजरात की राजनीति का उभार इसी का संकेत दे रहा है।
-2002 के बाद से गुजरात में सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ है। ऐसे तनाव में भारी कमी आई है। राज्य में 90 प्रतिशत आबादी हिन्दुओं की है। व्यापारी, कारोबारी, धंधे, व्यवसाय में लगे शांति प्रिय लोगों का समाज है। धार्मिक और राष्ट्रीय सोच का भी है। यह बड़ा असर कर सकता है। माना यह जा रहा है कि भाजपा ने एजेंडे पर तेजी से काम करना शुरू किया है।
दोनों तरफ से सतर्कता
प्रधानमंत्री, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की टीम जहां गुजरात के रग-रग से वाकिफ है, वहीं कांग्रेस भी कोई कसर नहीं छोड़ रही है। भाजपा पूरी सावधानी से हर दांव खेल रही है। तोड़-फोड़-जोड़ में भी पीछे नहीं है। इसके बरअक्स कांग्रेस उपाध्यक्ष मंदिरों में जा रहे हैं।
पाटीदार, ओबीसी, आदिवासी, दलित सब पर दांव लगा रहे हैं, लेकिन अल्पसंख्यक एजेंडे को टच तक नहीं कर रहे हैं। अहमद पटेल बस पार्टी के नेता भर हैं। अल्पसंख्यक प्रत्याशी भी नाम मात्र के हैं। यहां तक कि चुनावी सभा में भी सावधानी से बयान दे रहे हैं। सबसे बड़ी सफलता अल्पेश, जिग्नेश, हार्दिक के बयानों में बरती जा रही हैं। वे टकरा नहीं रहे हैं। तालमेल बना रहे हैं।
हाईटेक प्रचार
हाईटेक प्रचार, कार्यकर्ताओं के स्तर का प्रचार, होर्डिंग आदि में भाजपा का कोई सानी नहीं है। कंट्रोल रुम से प्रचार को नियंत्रित करना, व्हाट्सएप मैसेज से प्रचार, वीडियो, मोबाइल एप, टेलीफोन समेत भाजपा सभी माध्यमों का भरपूर इस्तेमाल कर रही है।
कार्यकर्ताओं के मामले में भी वह विरोधियों पर भारी है। पार्टी की आईटी सेल के प्रमुख सूत्र के अनुसार दोनों चरणों के मतदान से पहले गुजरात के हर मतदाता का दरवाजा कम से कम तीन बार जरूर खटखटाकर अपनी अपील करने की तैयारी है। वहीं पन्ना प्रमुख से लेकर बूथ स्तर तक भाजपा काफी बड़ी मेहनत कर रही है।