इस साल जून और जुलाई में अच्छी बारिश के बाद अगस्त में मानसूनी बादलों के अचानक बरसना बंद कर देने और देश में कई जगह सूखे जैसे हालात बनने का कारण अब सामने आ गया है।
बंगलूरू स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के शोधकर्ताओं ने इसके लिए उत्तरी अटलांटिक में वायुमंडलीय उथलपुथल को जिम्मेदार माना है।
इतना ही शोधकर्ताओं का कहना है कि पिछले सदी में ग्रीष्मकालीन मानसूनी सीजन के दौरान सूखा पड़ने की आधी से ज्यादा घटनाएं भी उत्तरी अटलांटिक की पर्यावरणीय हलचल के ही कारण हुई हैं।आईआईएससी के पर्यावरणीय व समुद्री विज्ञान (सीएओएस) की टीम का यह शोध ‘साइंस’ जर्नल में प्रकाशित हुए है।
पीएचडी छात्र प्रीतम बोरा द्वारा यह शोध केंद्रीय विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम के हिस्से के तौर पर फेलोशिप के तहत किया गया। बोरा के साथ इस शोध में सीएओएस के एसोसिएट प्रोफेसर वी. वेणुगोपाल और जय सुखातमे भी शामिल रहे।
बता दें कि जून और सितंबर के बीच देश के अधिकतर हिस्से में भारी बारिश कराने वाले ग्रीष्मकालीन मानसून पर एक अरब से अधिक आबादी आश्रित है।
मानसून के फेल होने पर देश के अधिकतर हिस्से में सूखा पड़ता है, जिसका सीधा दुष्प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर होता है। अभी तक इसके लिए अभी तक ‘अल नीनो’ को कारण माना जाता था, जिसमें भूमध्यवर्ती प्रशांत महासागर में पानी बेहद गर्म हो जाने से बना प्रभाव नमी से भरे बादलों को भारतीय उपमहाद्वीप से दूर खींच लेता था। लेकिन सीएओएस की टीम के अध्ययन में सामने आया है कि उत्तरी अटलांटिक से चलने वाली वायुमंडलीय लहर भी भारतीय मानसून को अनियमित करने में सक्षम है।
अध्ययन में पाया गया कि भारत में पिछली सदी के दौरान सूखा पड़ने की 23 में से 10 घटनाओं के दौरान अल नीनो प्रभाव मौजूद नहीं था। सूखा पड़ने की ये घटनाएं अगस्त के अंत में बारिश में अचानक भारी कमी आने की वजह से हुईं।
संस्थान ने कहा कि बारिश में कमी की ये घटनाएं उत्तरी अटलांटिक महासागर के मध्य क्षेत्र में एक पर्यावरणीय विक्षोभ बनने के कारण हुईं। यह विक्षोभ वायुमंडलीय धाराओं का एक ऐसा चक्र बनाता है, जो उपमहाद्वीप में सक्रिय मानसून को प्रभावित कर कमजोर बना देता है।
वेणुगोपाल के मुताबिक, साल 1980 के दशक के आरंभ में सूखे की घटनाओं को अलग-अलग रूपों में देखा जाता था। इन घटनाओं को समग्र रूप से नहीं देखा गया।
दरअसल अगस्त के अंत से सितंबर की शुरुआत के दौरान ठंडे उत्तर अटलांटिक वायुमंडल पर ऊपरी स्तर की हवाओं और गहरे चक्रवात की विसंगतियों के प्रभाव से वायुमंडलीय विक्षोभ उत्पन्नहोता है। यह विक्षोभ एक लहर के रूप में भारत की ओर मुड़ जाता है और तिब्बती पठार में मानसूनी हवाओं के प्रवाह को बाधित कर देता है।