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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव: 50-50 फार्मूले पर शिवसेना के दावे ने बढ़ाई भाजपा की बेचैनी

Fri, 25 Oct 2019 06:31 AM IST
संजीव कुमार झा हिमांशु मिश्र, अमर उजाला

सार

  • रणनीति तैयार करने में तालमेल के अभाव ने भाजपा-शिवसेना को बढ़ी बढ़त पाने से रोका
  • रणनीतिकारों को भरोसा था कि पार्टी अपने दम पर कम से कम 130 सीटें हासिल कर लेंगी
  • उद्धव ठाकरे ने सत्ता के लिए 50-50 फार्मॅूला अपनाने पर जोर दिया है
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विस्तार
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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों ने दिखा दिया है कि भाजपा और शिवसेना के आपस में गले मिलने के बावजूद दोनों के दिलों के बीच दूरियां कायम रही हैं। नतीजों ने भाजपा नेतृत्व की बेचैनी बढ़ा दी है। पार्टी की बेहतर प्रदर्शन करने में नाकामी ने अरसे से मौका ढूंढ रहे सहयोगी दल शिवसेना को मोलभाव करने का बड़ा अवसर मुहैया करा दिया है। शिवसेना अब 50-50 फॉर्मूले को लेकर भाजपा पर दबाव बढ़ाने का मौका नहीं चूकेगी।

भाजपा की चुनावी योजना पर फिरा पानी

चुनावी रणनीतिकार भी मानते हैं कि गठबंधन के बावजूद चुनाव प्रचार और रणनीति तैयार करने में तालमेल के अभाव ने भाजपा-शिवसेना को बढ़ी बढ़त पाने से रोक दिया। राज्य में भाजपा पुराना प्रदर्शन दोहराने तक में नाकाम रही, जबकि उसके कमजोर प्रदर्शन ने बहुत ज्यादा सीट नहीं जीतने के बावजूद शिवसेना को तेवर दिखाने का मौका दे दिया है।

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दरअसल भाजपा की योजना अपने हिस्से की कम से कम 90 फीसदी सीटें जीतकर बहुमत के करीब रहने की थी।

रणनीतिकारों को भरोसा था कि पार्टी अपने दम पर कम से कम 130 सीटें हासिल कर लेंगी। ऐसा होने पर वह बीते कार्यकाल की तरह शिवसेना के दबाव से खुद को बेपरवाह रखने में कामयाब रहती लेकिन लोकसभा की तरह विधानसभा चुनाव में भाजपा शिवसेना का गठबंधन तो हुआ, मगर दोनों दलों के नेता और कार्यकर्ता जमीन पर बेहतर तालमेल नहीं बैठा सके।

वह भी तब जब कई दिग्गज नेताओं और कार्यकर्ताओं का साथ छूटने के कारण कयास लगाए जा रहे थे कि राज्य में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन आईसीयू से बाहर नहीं निकल पाएगा।

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 उद्धव ठाकरे के तेवर से बेचैनी

अमित शाह-उद्धव ठाकरे - फोटो : PTI

उद्धव ठाकरे के तेवर से बेचैनी

बीते पांच साल तक शिवसेना के दबाव से बेपरवाह भाजपा की अब बेचैनी बढ़ गई है। औसत प्रदर्शन के बावजूद भाजपा की मजबूरियों को भांपते हुए शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सत्ता के लिए 50-50 फार्मॅूला अपनाने पर जोर दिया है। दबाव बढ़ाने के लिए शिवसेना ने इस फॉर्मूले के तहत पहले ढाई साल की सत्ता पर भी अपना दावा ठोक दिया है।

भाजपा की मुश्किल यह है कि कांग्रेस-एनसीपी को 100 के करीब सीटों पर जीत मिली है, जो शिवसेना के साथ मिलकर आसानी से बहुमत का आंकड़ा पार कर लेता है। जाहिर तौर पर भाजपा के प्रस्ताव ना मानने की स्थिति में शिवसेना एनसीपी-कांग्रेस के साथ जाने का संदेश देकर दबाव बनाएगी। भाजपा की योजना पहले की तरह सरकार चलाने और ढाई साल बाद शिवसेना का सीएम बनाने का प्रस्ताव देने की है।

 चार महीने में ही बदल गई परिस्थिति

चार महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को 288 विधानसभा क्षेत्रों में से 224 पर बढ़त हासिल हुई थी। विधानसभा चुनाव में यह घटकर 159 रह गई। गठबंधन के मत प्रतिशत में भी करीब 10 फीसदी की कमी आई है।
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