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लॉकडाउन के दौरान जंगली जानवरों के अवैध शिकार के मामले दोगुना बढ़े

Tue, 23 Jun 2020 04:06 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • लॉकडाउन के दौरान जंगली जानवरों के शिकार के मामले दोगुना बढ़े
  • द वाइल्ड लाइफ ट्रेड मॉनिटरिंग नेटवर्क 'ट्रैफिक' ने जारी की रिपोर्ट
  • रिपोर्ट में लॉकडाउन के पहले और बाद वाले छह हफ्तों का आंकड़ा
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अवैध शिकार - फोटो : File
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विस्तार
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कोरोना वायरस लड़ने के लिए विश्वभर में लगाए गए लॉकडाउन ने जंगली जानवरों के अवैध शिकार के मामले दोगुना बढ़ा दिए हैं। यही नहीं वैश्विक स्तर पर भी जानवरों के शिकार की संख्या तेजी से बढ़ी है। जानिए कि अवैध शिकार के मामले क्यों बढ़ रहे हैं, शिकारियों को रोकने में क्या परेशानियां आती हैं और इन पर कैसे रोक लगाई जा सकती है।

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द वाइल्ड लाइफ ट्रेड मॉनिटरिंग नेटवर्क 'ट्रैफिक' के मुताबिक विश्व स्तर पर अलग-अलग देशों में हुए लॉकडाउन की वजह से वन्य जीव संरक्षण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। सब कुछ बंद हो जाने की वजह से वन्य जीव संरक्षण के काम से जुड़े स्टाफ की गतिविधियां बाधित हुई। 

इससे जंगली जानवरों का शिकार करने वाले शिकारियों को अवैध शिकार करने का अच्छा मौका मिल गया। रिपोर्ट की माने तो प्रतिबंधित क्षेत्र में जंगली जानवरों का अवैध शिकार बढ़ा है। इसमें कुछ मामले व्यापार से भी जुड़े हुए हैं।
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कैसे तैयार की गई रिपोर्ट?
द वाइल्ड लाइफ ट्रेड मॉनिटरिंग नेटवर्क यानि कि ट्रैफिक एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्था है जो पांच महाद्वीपों में वाइल्ड लाइफ ट्रेड इश्यू और जैव विविधता पर रिसर्च का काम कर रही है, इसी के साथ कारोबारी दवा पर रिसर्च का काम पिछले चार दशकों से कर रही है। 

भारत में संस्था की अगुवाई कर रहे भारतीय वन अधिकारी डॉ साकेत बडोला ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि यह स्टडी भारत में 12 हफ्तों के दौरान दर्ज हुए मामलों के आधार पर तैयार की गई है। 

इन 12 हफ्तों में छह सप्ताह वो हैं जब देश में लॉकडाउन नहीं था और बाकी के छह हफ्ते वो हैं जब देश में लॉकडाउन था। रिपोर्ट के अनुसार शिकारियों ने सबसे ज्यादा बड़े स्तनधारी जीवों का शिकार किया है। जहां यह आंकड़ा 22 फीसदी था वहीं लॉकडाउन में बढ़कर 40 फीसदी हो गया। 

आंकड़ों का स्रोत क्या है?
ट्रैफिक ने जो आंकड़े जारी किए हैं उनका मुख्य स्रोत न्यूज रिपोर्ट, सोशल मीडिया, दर्ज कराएं नए मामले और स्थानीय लोगों की सूचना है। 

देश में अवैध शिकार के नियंत्रण में मुश्किल क्यों?

ब्लैक मार्केट में मांग अच्छी
जंगली जानवरों का अवैध शिकार खासतौर पर व्यापार के लिए किया जाता है। एशिया समेत दुनिया के दूसरे महाद्वीपों में जानवर और उसके शरीर के अलग-अलग इससे ब्लैक मार्केट में काफी महंगी कीमत में बेचे जाते हैं। 

कारोबार का डिजिटलीकरण
कुछ साल पहले तक भी जो व्यापार छिपते-छिपाते होता था, आज वो डिजिटल रूप ले चुका है। इंटरनेट ने एक तरफ भ्रष्टाचार को तो रोका ही है लेकिन अवैध शिकार को एक नया और ज्यादा खतरनाक रूप दे दिया है। कई जगह पर जंगली जानवर को पालतू बनाकर रखने का चलन है। इसके लिए भी जंगली जानवर को पकड़ा जाता है।

कम स्टाफ और वन क्षेत्र का विस्तृत होना
एक वरिष्ठ अधिकारी डॉ सरिता का कहना है कि ना सिर्फ हिमाचल प्रदेश बल्कि भारत के अन्य राज्यों में वन क्षेत्र बहुत बड़े हैं। ऐसे में कई बार प्रशासन को स्टाफ की कमी से जूझना पड़ता है। फॉरेस्ट गार्ड्स के पास एक बड़े इलाके में बहुत सारे काम होते हैं। ऐसे में अवैध शिकार के मामले में चूक होना संभव है लेकिन मुस्तैदी बनी रहती है।

आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल
जानवरों का अवैध शिकार करने वाले समय के साथ आधुनिक उपकरण और तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, इसलिए वन विभाग के लिए ये चुनौती और बढ़ जाती है। वन स्टाफ को भी तकनीकी, लॉजिस्टिक्स स्तर पर और सम्मिलित होने की जरूरत है।

क्या कहते हैं आंकड़े?

  • लॉकडाउन में जंगली जानवरों के अवैध शिकार के 88 मामले सामने आए जबकि लॉकडाउन शुरू होने से पहले ये 35 थे।
  • लॉकडाउन के दौरान 35 अलग-अलग किस्म के जंगली जानवरों की प्रजाति का शिकार हुआ, इसमें 15 प्रजातियां संरक्षित हैं।
  • ऐसी प्रजातियों के खिलाफ किसी भी तरह के अपराध के लिए सात साल की अधिकतम सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
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