सीएपीएफ के कैडर अधिकारियों को संगठित सेवा का दर्जा देने और उनके दूसरे हितों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हो रही है। 27 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में सीएपीएफ के कैडर अधिकारियों के वकील और सरकारी पक्ष के बीच तार्किक बहस हुई। जस्टिस अभय ओका एवं उज्जल भुइयां की बैंच ने इस मामले की सुनवाई की है। न्यायमूर्ति अभय एस ओका ने सुनवाई के बीच दिए अपने रिमार्क में कहा, इन बलों में प्रतिनियुक्ति को धीरे धीरे कम किया जाए। सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड 'एसएजी' में तो प्रतिनियुक्ति बंद हो। इस केस के संदर्भ में जो कुछ भी कोर्ट में बोला गया है, दोनों पक्षों को उसकी तीन चार पेजों में समरी बनाकर एक सप्ताह के अंदर कोर्ट को देने का आदेश दिया गया है। सीएपीएफ के पूर्व अफसरों का कहना है कि वे सुप्रीम कोर्ट में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणियों से आहत हुए हैं।
इनका दावा है कि केंद्र की 'समूह-'ए' सेवा में 19-20 वर्ष में सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (एसएजी) मिल रहा है तो वहीं अर्धसैनिक बलों में 36 वर्ष तक लग रहें हैं। पूर्व अफसरों के मुताबिक, 27 फरवरी को सर्वोच्च न्यायालय में जस्टिस अभय ओका एवं उज्जल भुइयां की बैंच के समक्ष अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल द्वारा सीएपीएफ के संगठित समूह 'ए' अधिकारियों के सेवा नियमों और कैडर समीक्षा के संबंध में एक प्रकरण की सुनवाई के दौरान कई तथ्य प्रस्तुत किए गए। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में केस की सुनवाई के दौरान उनकी भावनाओं को ठेस पहुंची है। जो बहस हुई है, उसने कई आपत्तियों को जन्म दे दिया है। एएसजी की दलील में सीएपीएफ अधिकारियों को अक्षम और प्रदर्शन करने के लिए पेशेवर रूप से अपरिपक्व बताया गया है।
दूसरी तरफ उच्च स्तर पर प्रतिनियुक्ति और ब्रिटिश औपनिवेशिक समय से आईपीएस की चली आ रही प्रतिष्ठा एवं विशिष्ट स्थिति को सही ठहराने का प्रयास हुआ है। सीएपीएफ के पूर्व अफसरों को यह बयान और रुख अपमानजनक और निराधार लगता है। यह रुख सीएपीएफ के उन अधिकारियों के बलिदानों, कठिन परिश्रम एवं समर्पण को तुच्छ करता है, जिन्होंने राष्ट्र की आंतरिक और सीमा सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस तरह के अतिवादी वक्तव्य न केवल उन अधिकारियों और सैनिकों का मनोबल गिराते हैं, जो अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों में सेवा करते हैं।
भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों और सीएपीएफ के बीच कृत्रिम श्रेष्ठता/पदानुक्रम बनाने का प्रयास किया जाता है। यह बात राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रशासनिक सद्भाव के लिए हानिकारक है। सीएपीएफ के पूर्व अफसरों का कहना है, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल का भारतीय पुलिस सेवा अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की निरंतरता के लिए सीएपीएफ अधिकारियों की कथित अक्षमता के आरोप औचित्यहीन, निराधार, भ्रामक और तथ्यों के विपरीत हैं।
बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद बताते हैं, खासतौर से जूनियर स्तर पर सीएपीएफ के कैडर अधिकारियों में पदोन्नति को लेकर परेशानी देखी जा रही है। पदोन्नति में देरी के चलते अफसर नौकरी छोड़ रहे हैं। वे आर्थिक फायदों में भी पिछड़ जाते हैं। सीआरपीएफ और बीएसएफ में तो डेढ़ दशक में पहली पदोन्नति मिल रही है। डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों में ओजीएएस यानी 'आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' के तहत सेवा नियम बनाने के आदेश जारी किए थे। अभी तक सर्विस रूल नहीं बनाए गए हैं। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बावजूद कैडर अफसरों को कोई राहत नहीं दी।
कैडर अधिकारियों के नेतृत्व में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों ने राष्ट्र की सुरक्षा तंत्र में अपनी विशिष्ट और निर्णायक भूमिका के साथ एक लंबी यात्रा की है। सीएपीएफ अफसरों ने अपने अपने डोमेन में विशेषज्ञता अर्जित कर ली है। सीएपीएफ अधिकारियों ने कंपनी कमांडर से लेकर कमांड के उच्च पदों तक, समय-समय पर अनुकरणीय नेतृत्व, व्यावसायिकता और परिचालन दक्षता का प्रदर्शन किया है। इतिहास, सैकड़ों सीएपीएफ अधिकारियों द्वारा दिए गए सर्वोच्च बलिदानों का साक्षी है।
पूर्व अफसरों के अनुसार, सर्वोच्च अदालत में एएसजी का रुख उनकी अपनी समझ का हो सकता है, गृह मंत्रालय के शीर्ष नेतृत्व की राय नहीं हो सकती है। अगर ऐसा होता तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा 2019 में सीएपीएफ को संगठित समूह ए (ओजीएएस) का दर्जा और गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) को मंजूरी नहीं दी जाती। पूर्व अधिकारियों का कहना था कि यह तथ्य सीएपीएफ के प्रति गृह मंत्री और शीर्ष एमएचए नेतृत्व के करुणामय दृष्टिकोण और संवेदनशीलता को साबित करता है। उन्होंने गृह मंत्रालय से एएसजी की भ्रामक टिप्पणियों पर ध्यान देने और सीएपीएफ की विश्वसनीयता की पुष्टि करने का आग्रह किया है।
बीएसएफ के पूर्व आईजी भोला नाथ शर्मा बताते हैं, मौजूदा समय में तकरीबन हर रैंक पर ठहराव सा है। दूसरी ओर, कैडर अफसरों को वित्तीय फायदे भी पूरे नहीं मिलते। वे बल की नीतियों से संतुष्ट नहीं होते। कैडर अफसरों को एक ही रैंक में लंबे समय तक काम करना पड़ता है। जब उनकी शिकायत दूर नहीं होती तो वे दूसरा विकल्प खोजते हैं। कुछ बलों में पदोन्नति तेज गति से हो रही है, लेकिन बीएसएफ और सीआरपीएफ में यह रफ्तार बहुत धीमी है।
पूर्व अफसरों के मुताबिक, सीआरपीएफ के पहले महानिदेशक वीजी कनेत्कर ने कहा था, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। 1955 के फोर्स एक्ट में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इतना ही नहीं, 1970 में तत्कालीन होम सेक्रेट्री लल्लन प्रसाद सिंह, जेएस, बीएसएफ व सीआरपीएफ के डीजी ने भी लिखा था कि केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में कैडर अधिकारियों को ही नेतृत्व करने का मौका दिया जाए। ऐसे में वे पदोन्नति के जरिए इन बलों में आगे बढ़ते रहेंगे और टॉप तक पहुंच जाएंगे। पदोन्नति का संकट भी नहीं होगा।
यह आवश्यक है कि सीएपीएफ अधिकारियों के नेतृत्व को उचित मान्यता दी जाए। यह भी सुनिश्चित हो कि उनकी बहादुरी और बलिदानों को कभी भी कम नहीं आंका जाए। सीएपीएफ, राष्ट्र की सेवा, समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ करते रहेंगे। उन्हें अन्य समूह ए के अधिकारियों के समकक्ष सम्मान, भूमिका तथा भेदभाव विहीन वातावरण प्रदान किया जाना चाहिए। वे सही मायने में इसके हकदार हैं। अदालत में चल रहे ये मामले डीओपीटी नीतियों में निहित उचित वेतन, भत्ते और प्रगति प्राप्त करने के लिए एक संघर्ष है। इसे किसी विशेष सेवा के साथ टकराव के रूप में कदापि नहीं देखा जाना चाहिए।
सीएपीएफ का शीर्ष नेतृत्व भारतीय पुलिस सेवा अधिकारियों को ही प्रदत्त एवं आरक्षित है। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के अधिकारी लगभग डेढ़ दशक से अन्य संगठित समूह ए सेवाओं के अधिकारियों के साथ समान स्तर पर करियर प्रगति और वित्तीय उन्नयन प्राप्त करने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। यह लाभ अभी तक सीएपीएफ को पूरी तरह से नहीं दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप वे अन्य समूह ए सेवाओं के अधिकारियों से बहुत पिछड़े हुए हैं। जहां अन्य समूह ए सेवाओं में 19-20 वर्ष में वरिष्ठ प्रशासनिक श्रेणी (एसएजी) दी जा रही है, वहीं सीएपीएफ में यह अंतराल या अवधि लगभग 36 वर्ष है, जो दो-गुणा से भी अधिक है।
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सीएपीएफ कैडर की तरफ से कहा गया कि इन बलों में प्रतिनियुक्ति को धीरे धीरे खत्म किया जाना चाहिए। इन बलों में पहले सैन्य अधिकारी भी प्रतिनियुक्ति पर आते थे, लेकिन बाद में उस पहल को बंद कर दिया गया। आईपीएस की प्रतिनियुक्ति को नहीं रोका जा सका। अब आईपीएस की प्रतिनियुक्ति बंद होनी चाहिए। वजह, आईपीएस के चलते कैडर अधिकारी, पदोन्नति में पिछड़ जाते हैं। उन्हें नेतृत्व का अवसर नहीं मिल पाता।
कैडर अधिकारियों के नेतृत्व को दूसरे दर्जे का माना जाता है। यह कहना कि सीएपीएफ में अच्छी लीडरशिप की जरुरत है तो उसके लिए आईपीएस ला रहे हैं, यह ठीक नहीं है। 1970 के दशक में तत्कालीन होम सेक्रेट्री, बीएसएफ व सीआरपीएफ डीजी द्वारा कहा गया था कि इन बलों के अधिकारियों को ही नेतृत्व के लिए तैयार किया जाए। केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। कैडर अधिकारी, पदोन्नति के जरिए आगे बढ़ते रहेंगे और टॉप तक पहुंच जाएंगे, लेकिन व्यवहार में अभी तक ऐसा कुछ नहीं हो सका।