कर्नाटक में जब कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) के गठबंधन से बनी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में विपक्षी एकता देखने को मिली थी। यदि राजनीति की नजर से देखा जाए तो इन घटनाओं का प्रतीकात्मक महत्व है। विपक्ष के बीच सबसे बड़ी चुनौती प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करना है क्योंकि राहुल गांधी के नाम पर ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश और चंद्रबाबू सहमत नहीं हैं।
आने वाले कुछ दिनों में चुनाव की साफ तस्वीर आ जाएगी। ऐसे में क्षेत्रीय दलों को खुलकर मोदी सरकार खिलाफ जाने से होने वाले नफे-नुकसान का जायजा लेना है। इसी बीच महागठबंधन में प्रधानमंत्री पद के स्वघोषित दावेदारों में
ममता बनर्जी और मायावती का नाम है। उन्हें जवाब देने के लिए कांग्रेस ने शरद पवार का नाम आगे कर दिया है। कांग्रेस का साथ मिलने से पवार खुद को फ्रंट लाइन में बनाए रखने की कोशिश में हैं।
पिछले दिनों मुंबई में हुई अपनी पार्टी की बैठक के बाद पवार ने विपक्ष की राजनीति को लेकर दो अहम बातें कहीं थीं। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के दावेदार को लेकर कोई चर्चा नहीं होगी। जिसका साफ मतलब है कि दावेदार घोषित करने की जरुरत नहीं है। दूसरी बात उन्होंने कही कि प्रधानमंत्री पद को लेकर सबसे बड़ी पार्टी फैसला करेगी। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का मतलब कांग्रेस माना जा रहा है।
सबसे बड़ी पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री पद का फैसला करने वाला बयान देने का मतलब ममता और मायावती को यह संदेश देना था कि वह अभी खुद को दावेदार ना समझें। इससे कांग्रेस को यह फायदा होगा कि दोनों लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस की बात सुनेंगे और सीटों को लेकर मोल-भाव नहीं करेंगे। वहीं पवार को यह फायदा होगा कि इस पद के लिए उनकी दावेदारी कायम रहेगी।
शरद पवार को यह बात अच्छी तरह से पता है कि कांग्रेस के सद्भाव पर ही वह अपनी दशकों पुरानी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा को पूरा कर सकते हैं। महाराष्ट्र में आपसी ताल-मेल को लेकर उनकी कांग्रेस अध्यक्ष
राहुल गांधी से तीन बार बात हो चुकी है। उन्होंने राहुल से बात ना करने की अपनी पुरानी नीति छोड़कर उनसे सद्भाव से बात की।