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30 दिन में 'लाल आतंक' को चोट: 26 नक्सली खत्म तो 98 ने डाले हथियार, 98 का सरेंडर; CRPF का 100 वां FOB तैयार

सार

'सीआरपीएफ' और इसकी विशेष इकाई 'कोबरा', डीआरजी व राज्यों की पुलिस, नक्सलियों के खात्मे/सरेंडर कराने में लगी हैं। सितंबर माह के दौरान सुरक्षा बलों को इस मुहिम में बड़ी कामयाबी मिली है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की है कि मार्च 2026 तक देश के सभी हिस्सों से नक्सलवाद पूरी तरह खत्म हो जाएगा। 'सीआरपीएफ' और इसकी विशेष इकाई 'कोबरा', डीआरजी व राज्यों की पुलिस, नक्सलियों के खात्मे/सरेंडर कराने में लगी हैं। सितंबर माह के दौरान सुरक्षा बलों को इस मुहिम में बड़ी कामयाबी मिली है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सीआरपीएफ एवं संबंधित राज्यों की पुलिस के समक्ष 98 माओवादियों ने सरेंडर किया है। साथ ही 98 माओवादी पकड़े गए हैं। सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ में 26 नक्सली मारे गए हैं। सीआरपीएफ/कोबरा, ने नक्सलियों के गढ़ में लगातार बढ़त लेते हुए छत्तीसगढ़ में 100 एफओबी स्थापित कर लिए हैं। 

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सीआरपीएफ की सक्रियता भूमिका वाले क्षेत्रों में सितंबर माह के दौरान 64 हथियार भी बरामद किए हैं। विभिन्न इलाकों में 55 आईईडी, 2656 राउंड गोलियां, 94 ग्रेनेड, दो बम, 1006 डेटोनेटर, 113.85 किलोग्राम विस्फोटक पदार्थ, 177140 रुपये कैश, 45 जिलेटिल स्टिक और 4 किलोग्राम नशीले पदार्थ बरामद जब्त किए गए हैं। नक्सलियों के गढ़ में पहुंचकर सीआरपीएफ व दूसरे बलों के जवान 48 घंटे में 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित कर रहे हैं। अब इसी एफओबी के चक्रव्यूह में फंसकर नक्सली मारे जा रहे हैं। सुरक्षा बलों ने ऐसा जाल बिछाया है कि जिसमें नक्सलियों के पास दो ही विकल्प बचते हैं। एक, वे सरेंडर कर दें और दूसरा, सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में गोली खाने के लिए तैयार रहें। 

केंद्रीय सुरक्षा बल के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, नक्सलियों का अंत अब कितना निकट है, यह अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2023 में 50 नक्सली मारे गए थे तो वहीं 2024 में मुठभेड़ के दौरान 290 नक्सलियों को मौत के घाट उतारा गया। 2025 में करोड़ों रुपये के दर्जनभर इनामी नक्सली मारे जा चुके हैं। 2019 से लेकर अभी तक घने जंगलों में साढ़े तीन सौ से ज्यादा कैंप स्थापित किए गए हैं। 2024 में 58 कैंप स्थापित हुए थे। इस वर्ष सीआरपीएफ ने अकेले छत्तीसगढ़ में ही 100 कैंप स्थापित कर दिए हैं। ये एफओबी नक्सलियों के किले को ढहाने में आखिरी किल साबित हो रहे हैं। जिस तेजी से 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित हो रहे हैं, उससे यह बात साफ है कि तय अवधि में नक्सलवाद को खत्म कर दिया जाएगा। नक्सलियों के सामने अब दो ही रास्ते बचे हैं। वे सरेंडर कर दें या मरने के लिए तैयार रहें। 
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सुरक्षा बलों ने नक्सलियों का हर वो ठिकाना ढूंढ निकाला है, जो अभी तक एक पहेली बना हुआ था। उनके स्मारक गिराए जा रहे हैं। 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' या कैंप स्थापित होने के कारण एक चक्रव्यूह बनता जा रहा है। इसी में नक्सली फंसते जा रहे हैं। जंगल में सुरक्षा बल, चारों तरफ से घेरा डालकर आगे बढ़ रहे हैं। एक एफओबी को स्थापित करने में दो या तीन दिन लगते हैं। भले ही जवानों को टैंट या कच्चे में रहना पड़े, मगर वे आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। एक माह बाद ही नए कैंप का ले आउट प्लान तैयार हो जाता है। ऐसे में नक्सली, जंगल में कहां तक पीछे भागेंगे। उनकी हर तरह की सप्लाई चेन, मसलन रसद, दवाएं, राशन और मुखबिरी, सब खत्म होती जा रही हैं। उनके ट्रेनिंग कैंप तबाह किए जा रहे हैं। नतीजा, अब नई भर्ती प्रारंभ नहीं हो पा रही है। ट्रेनिंग के लिए न तो जगह बची है और न ही युवक। आर्थिक मदद का भी संकट खड़ा हो गया है। 

सीआरपीएफ/कोबरा द्वारा अब महज दस पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर दो-दो सुरक्षा कैंप या 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित किए जा रहे हैं। इस स्थिति में नक्सलियों की कमर टूट रही है। पहले नक्सलियों द्वारा बटालियन को साथ लेकर सुरक्षा बलों पर हमला बोला जाता था। उसके बाद वे कंपनी पर सिमट गए। अब कंपनी की बजाए नक्सली एक छोटी सी टीम तक सिमटते जा रहे हैं। सीआरपीएफ के सूत्रों का कहना है, जंगल में 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित करना आसान काम नहीं होता। इस काम में आईईडी ब्लास्ट, यूबीजीएल (अंडर बैरल ग्रेनेड लांचर) अटैक या नक्सली हमले का जोखिम सदैव बना रहता है। सीआरपीएफ द्वारा जहां पर कैंप स्थापित किया जाता है, उससे पहले वहां कोई नहीं होता। 

लोकल मशीनरी और पुलिस, सीआरपीएफ के साथ ही कैंप साइट पर पहुंचती है। वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों की संख्या में उत्तरोत्तर गिरावट आई है। लगातार बेहतर हो रही स्थिति को देखते हुए, पिछले छह वर्षों में वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों की तीन बार समीक्षा की गई है, जिसमें अप्रैल 2018 में 126 से घटकर 90 जिले, जुलाई 2021 में 70 और फिर अप्रैल 2024 में घटकर 38 जिले रह गए। 
2010 के उच्च स्तर की तुलना में 2023 में वामपंथी उग्रवाद से संबंधित हिंसा में 73% की कमी आई है। इसी अवधि के दौरान परिणामी मौतों (नागरिकों + सुरक्षा बलों) में भी 86% की कमी आई है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी व्यय योजना में 2004 से 2014 तक 1180 करोड़ रूपए खर्च हुए थे, जिसे मोदी सरकार ने लगभग 3 गुना बढ़ाकर बढ़ाकर 2014 से 2024 के बीच 3,006 करोड़ रूपए कर दिया है। एलडब्लूई के प्रबंधन के लिए केन्द्रीय एजेंसियों को सहायता योजना में 1055 करोड़ रूपए दिए गए। विशेष केन्द्रीय सहायता एक नई योजना है, जिसके तहत मोदी सरकार ने पिछले 10 साल में 3590 करोड़ रूपए खर्च किए हैं। एलडब्लूई में अब तक कुल 14367 करोड़ रूपए अनुमोदित किए गए हैं, जिसमें से 12000 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। 

2004 से 2014 के बीच 10 साल में 66 फोर्टीफाइड पुलिस स्टेशन बनाए गए थे, जबकि 2014 से 2024 के मध्य के 10 साल में 544 बनाए गए हैं। 2014 से पहले के 10 साल में 2900 किलोमीटर सड़क नेटवर्क निर्माण हुआ था, जो पिछले 10 साल में बढ़कर 14,400 किलोमीटर हो गया है। 2014 से 2024 तक 6000 मोबाइल टावर लगा दिए गए हैं। इनमें से 3551 टावर को 4G बनाने का काम भी समाप्त हो गया है। 2014 से पहले मात्र 38 एकलव्य मॉडल स्वीकृत हुए थे, अब पिछले 10 साल में 216 स्कूल स्वीकृत हुए हैं। इनमें से 165 एकलव्य मॉडल स्कूल अस्तित्व में आ गए हैं। 

2004 से 2014 के बीच 10 साल में 16463 हिंसा की घटनाएं हुई थी, जो लगभग 53% की कमी के साथ अब घटकर 7700 तक सीमित रह गई हैं। इसी प्रकार नागरिकों और सुरक्षाबलों की मृत्यु में 70% की कमी हुई है। हिंसा रिपोर्ट करने वाले 96 जिले, अब 57 प्रतिशत की कमी के साथ घटकर 16 रह गए हैं। हिंसा की सूचना देने वाले पुलिस स्टेशन भी 465 में से 171 रह गए हैं, जिनमें से 50 पुलिस स्टेशन नए बने हैं। सुरक्षा वैक्यूम को भरने के लिए 2019 से अब तक 290 से अधिक कैंप बनाए गए हैं। 15 नए जॉइंट टास्क फोर्स गठित हुए हैं।

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