राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ 7 दलों की ओर से दिए गए महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस को खारिज कर दिया है। सभापति ने 20 पेज के अपने आदेश में सीजेआई पर लगे आरोपों को आधारहीन और कल्पना पर आधरित बताते हुए नोटिस खारिज करने के 22 कारण गिनाए हैं।
आदेश में नोटिस देने के बाद विपक्ष का इससे संबंधित मसौदे को मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक करने को संसदीय नियमों का उल्लंघन बताया है। उन्होंने कहा कि कानूनविदों से सभी पहलुओं पर विमर्श और व्यक्तिगत तौर पर सभी तथ्यों पर गौर करने के बाद उन्होंने नोटिस को खारिज करने का फैसला किया।
विपक्ष के आरोपों का हवाला देते हुए सभापति ने कहा कि ज्यादातर आरोपों के संदर्भ में तथ्यों की जगह ऐसा लगता है, ऐसा अनुमान है, ऐसी संभावना है का जिक्र किया गया है। ऐसे में बिना किसी पुख्ता सबूत के आधार पर सीजेआई के खिलाफ जांच का आदेश देना एक संवैधानिक संस्था को जनता की नजरों में कमजोर करना होगा। इसके अलावा कदाचार के आरोप संविधान के अनुच्छेद 124(4) के बाहर होने के कारण इस मामले में अग्रिम जांच के आदेश नहीं दिए जा सकते। सीजेआई पर महत्वपूर्ण मामलों को चुनिंदा बेंचों को सुनवाई के लिए स्थानांतरित किए जाने के आरोपों को भी सभापति ने खारिज कर दिया। इसके जवाब में आदेश में कहा गया है कि सीजेआई चीफ ऑफ रोस्टर होते हैं। कामिनी जायसवाल बनाम भारत सरकार के केस में भी यह तय हो चुका है कि केस केलिए बेंच चयन का अधिकार सीजेआई के ही पास है।
अपने आदेश में सभापति ने नोटिस देने वाले विपक्ष की मंशा पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देने के तत्काल बाद विपक्ष ने मीडिया के जरिए मसौदे का प्रचार किया। यह कदम राज्यसभा के नियमों का उल्लंघन है।