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नायडू ने आलोचकों को दिया जवाब, काफी सोच-विचार के बाद खारिज किया गया महाभियोग प्रस्ताव

Wed, 25 Apr 2018 04:37 AM IST
एजेंसी, नई दिल्ली
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वैंकेया नायडु
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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज करने के फैसले के कारण आलोचना का केंद्र बने राज्यसभा सभापति वेंकैया नायडू ने मंगलवार को कहा कि उन्होंने जल्दबाजी में निर्णय नहीं लिया है। इस मामले में एक महीने से ज्यादा समय तक गहराई से सोच-विचार करने के बाद ही वे नतीजे पर पहुंचे हैं। उन्होंने कहा कि राज्यसभा सभापति का कार्यालय पोस्ट ऑफिस नहीं है बल्कि उसकी संवैधानिक हैसियत है। 
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इस फैसले के लिए उन्हें बधाई देने पहुंचे सुप्रीम कोर्ट के 10 वकीलों के एक समूह को संबोधित करते हुए नायडू ने कहा, ‘मैंने अपना काम कर दिया है और मैं उससे संतुष्ट हूं। इसके लिए उन्हें बधाई देने की जरूरत नहीं है क्योंकि उन्होंने वही किया जिसकी उनसे उम्मीद थी।’ उन्होंने कहा कि महाभियोग प्रस्ताव को संवैधानिक प्रावधानों और जजेज इनक्वायरी एक्ट, 1968 के आधार पर खारिज किया गया है। जजेज इनक्वायरी एक्ट की धारा 3 में स्पष्ट कहा गया है कि महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने या खारिज करने से पहले राज्यसभा के सभापति को प्रथम दृष्टया उस पर विचार करना चाहिए। 

उन्होंने कहा कि भले ही महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के तीन दिन के अंदर उसे खारिज किया गया लेकिन मीडिया में पिछले एक महीने से इसकी चर्चा थी और इसके मद्देनजर वे इसको लेकर काफी पहले से तैयारी कर रहे थे। इसलिए यह कहना गलत होगा कि फैसला जल्दबाजी में लिया गया है।
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पहले भी खारिज हुआ था प्रस्ताव

सूत्रों के अनुसार नायडू से मिलने गए वकीलों ने उन्हें बताया कि सदन के अध्यक्ष द्वारा महाभियोग प्रस्ताव खारिज करने का यह पहला मामला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के जज जेसी शाह के खिलाफ ऐसे ही एक प्रस्ताव को तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष जीएस ढिल्लन ने खारिज कर दिया था। शाह बाद में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बने। 

जजों को डराने के लिए लाया गया था महाभियोग प्रस्ताव: जेटली

नई दिल्ली। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मंगलवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एवं अन्य जजों को डराने के लिए कांग्रेस की अगुवाई में अपुष्ट आधार पर महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। अपने एक फेसबुक पोस्ट में जेटली ने कहा कि किसी जज के खिलाफ दुराचार के अति दुर्लभ मामले में ही महाभियोग प्रस्ताव लाया जाना चाहिए। यही नहीं, उसे साबित करने के लिए ठोस और मजबूत साक्ष्य भी होने चाहिए। महज अफवाहों को बतौर सबूत पेश नहीं किया जा सकता है।

सभापति के फैसले के खिलाफ कांग्रेस के सुप्रीम कोर्ट जाने के सवाल पर जेटली ने कहा कि संसद अपने न्यायाधिकार में सर्वोच्च है और इसकी प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती है। उन्होंने कहा कि कोर्ट की लड़ाई को संसद तक ले जाने की प्रवृत्ति को विभिन्न पार्टियों के ऐसे वकील बढ़ावा दे रहे हैं जो सांसद भी हैं। चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव उसकी एक मिसाल है। 
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