जलवायु परिवर्तन ने मौसम से जुड़ी घटनाओं की सटीक भविष्यवाणी करने की विश्वभर की पुर्वानुमान एजेंसियों की क्षमता को प्रभावित किया है। लिहाजा भारत मौसम विभाग इस चुनौती से निपटने के लिए और अधिक रडार स्थापित कर रहा है और अपनी उच्च प्रदर्शन वाली गणना को अपडेट कर रहा है। आईएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने यह बात कही।
महापात्र ने कहा, हमारे पास 1901 से लेकर अबतक मानसूनी वर्षा का डिजिटल डाटा उपलब्ध है। इसके तहत उत्तर, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में वर्षा में कमी, जबकि पश्चिम राजस्थान जैसे पश्चिम के कुछ हिस्सों में वर्षा में वृद्धि हुई है
उन्होंने आगे कहा कि पूरे देश पर गौर करें तो मानसूनी वर्षा का कोई स्पष्ट रुझान नजर नहीं आता। मानसून अनियमित है और इसमें व्यापक स्तर पर उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं।
बता दें कि हाल ही में केंद्र सरकार ने संसद को सूचित किया था कि उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मेघालय और नगालैंड में बीते तीस वर्षों (1989 से 2018) में दक्षिण-पश्चिम मानसून से होने वाली वर्षा में उल्लेखनीय कमी देखी गई है। इन पांच राज्यों और अरुणाचल प्रदेश व हिमाचल प्रदेश में वार्षिक औसत वर्षा में भी उल्लेखनीय कमी आई है।
आईएमडी प्रमुख ने कहा, हालांकि 1970 से अबतक के वर्षा के दैनिक डाटा का विश्लेषण करने से पता चलता है कि देश में भारी वर्षा के दिनों में वृद्धि हुई है, जबकि हल्की या मध्यम स्तर की वर्षा के दिनों में कमी आई है। इसका मतलब है कि अगर वर्षा नहीं हो रही है तो एकदम नहीं हो रही है और अगर हो रही है तो बहुत ज्यादा पानी बरस रहा है।
उन्होंने बताया कि प्रभाव आधारित पूर्वानुमान में सुधार होगा और यह 2025 तक अधिक सटीक बन जाएगा। महापत्र ने कहा कि आगामी वर्षों में विभाग पंचायत स्तर और शहरों के किसी खास क्षेत्र में पूर्वानुमान भी उपलब्ध करा पाएगा। विभाग पूर्वानुमान में सुधार के लिए अपने रडार, स्वचालित मौसम केंद्रों, वर्षा मापक और सैटेलाइट की संख्या बढ़ाकर अपने अवलोकन तंत्र को मजबूत कर रहा है।