जलवायु परिवर्तन के कारण 80 फीसदी किसान प्रभावित
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मौसम का सटीक अनुमान लगाना भी हो रहा कठिन
सचिव रविचंद्रन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमंडल में अस्थिरता बढ़ने से मौसम का सटीक पूर्वानुमान लगाना भी कठिन होता जा रहा है। कई मौसमी घटनाएं अब छोटे क्षेत्रों में कम समय में एक साथ हो रही हैं। मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक महापात्रा ने कहा कि एक स्टडी में सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन भारी वर्षा की भविष्यवाणी करने के लिए लगने वाले समय को तीन दिन से घटाकर डेढ़ दिन कर सकता है।
जल संकट भी गहरा सकता
रविचंद्रन ने कहा कि उत्तर-पश्चिम भारत को प्रभावित करने वाले पश्चिमी विक्षोभों की संख्या और तीव्रता में कमी होने के कारण हिमालय में बर्फ का जमाव कम हो रहा है। बर्फ पिघलने की दर बढ़ रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि इनपुट कम है और आउटपुट अधिक है। इसका मतलब है कि पानी की उपलब्धता कम हो रही है। भारत और चीन सहित दो अरब से अधिक लोग इस पानी पर निर्भर हैं। यह एक बहुत गंभीर मुद्दा है और हमें भविष्य के बारे में चिंतित होना चाहिए। बर्फ से ढकी हिमालय और हिंदुकुश पर्वत शृंखलाओं को तीसरा ध्रुव कहा जाता है, जो ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सबसे बड़े जल संसाधन रखती हैं। दुनिया की आबादी का सातवां हिस्सा इन पर्वत श्रृंखलाओं से निकलने वाली नदियों के पानी पर निर्भर है।
2024 रहा सबसे गर्म वर्ष
मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार साल 1901 और 2018 के बीच भारत का औसत तापमान लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ा। वहीं वर्ष 2024 भारत में 1901 के बाद से अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा। इसमें औसत न्यूनतम तापमान 0.90 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा।
देश की मुख्य फसल हैं गेहूं-चावल
भारत में 2023-24 फसली वर्ष में 113.29 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन हुआ था। यह वैश्विक उत्पादन का 14 फीसदी था। जबकि इसी फसली वर्ष में 137 मिलियन टन चावल का उत्पादन हुआ। चावल और गेहूं देश के मुख्य आहार हैं और इस पर देश की 1.4 बिलियन निर्भर है। वहीं भारत में लगभग आधी आबादी कृषि पर निर्भर है। देश में 80 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है।