सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसले में कहा कि एनडीपीएस मामलों अगर जांच अधिकारी ही शिकायतकर्ता है तो यह किसी अभियुक्त को बरी करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी एक ही हो तो यह आरोपी के खिलाफ कोई पक्षपात नहीं है।
जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस इंदिरा बनर्जी, जस्टिस विनीत सरन, जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस एस रविंद्र भट की संविधान पीठ ने कहा है कि जांच करने वाला अधिकारी भी शिकायतकर्ता हो सकता है। सिर्फ इसलिए कि शिकायतकर्ता जांच अधिकारी है, यह जांच को कम नहीं करता है। इसमें पूर्वाग्रह का आरोप सही नहीं है।
पीठ ने कहा है कि शिकायतकर्ता व जांच अधिकारी एक होने मात्र से अभियुक्त को फायदा नहीं मिल सकता है। पीठ ने कहा है कि हर मामले का स्वरूप अलग होता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ अंदेशे के आधार पर किसी की सत्यनिष्ठा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता जब तक आरोपी यह साबित न कर दे कि जांच अधिकारी का रवैया पक्षपातपूर्ण है।
सिर्फ शक के आधार पर अभियोजन पक्ष की थ्योरी को धता नहीं ठहराया जा सकता और आरोपी को सीधे तौर पर बरी नहीं किया जा सकता जब तक वह यह साबित न कर दे कि जांच अधिकारी का रवैया पक्षपातपूर्ण था।
वास्तव में संविधान पीठ को यह तय करना था कि नारकोटिक्स ड्रग्स और साइकोट्रॉपिक पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस) के तहत अगर जांच अधिकारी और शिकायतकर्ता एक ही व्यक्ति है तो क्या ट्रायल को भंग कर दिया जाना चाहिए?