सचिन पायलट को उम्मीद थी कि उनके साथ करीब 25 विधायक रहेंगे। भाजपा के मध्यस्थों को भरोसा था कि 5-7 विधायक भाजपा के नेता तोड़ लेंगे। इस तरह से अशोक गहलोत की सरकार अल्पमत में आ जाएगी। रविवार की सुबह तक सचिन पायलट के साथ कुल 18-19 विधायक राजस्थान से मानेसर, दिल्ली आ गए थे। कहा जा रहा था कि 8-10 और सुबह होते-होते आ जाएंगे।
दूसरी तरफ राजस्थान पुलिस हर मोर्चे पर सक्रिय थी। लिहाजा विधायक राजस्थान से आ नहीं सके। आए हुए विधायकों में से चार-छह को लगा कि पासा उल्टा पड़ रहा है। लिहाजा वह रणनीति बनाकर जयपुर लौट गए। क्योंकि इन विधायकों के पास गहलोत खेमे में 103 विधायकों का समर्थन होने की सूचना आ गई थी। सचिन पायलट के पास केवल 12 विधायकों का समर्थन रह गया। जाहिर सी बात है कि यह उनके ऑपरेशन के लिए पर्याप्त नहीं था।
अशोक गहलोत की आखिरी चतुराई
अशोक गहलोत ने शनिवार की रात में विधायकों को इकट्ठा किया। संख्या 60 को पार कर गई? यहां से अशोक गहलोत ने राजनीतिक समझ को तेज करते हुए बयान देना शुरू कर दिया। उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को आश्वस्त किया कि चिंता की बात नहीं है। पायलट कुछ न बिगाड़ सकेंगे। गहलोत ने अपनी बात को आधार देने के लिए पहले रविवार रात 9.00 बजे विधायकों की बैठक बुलाकर संख्याबल (शक्ति परीक्षण) दिखाने का रास्ता चुना।
यह बैठक फिर सोमवार सुबह 10.30 बजे रखी गई। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बारीक नजर रखते हुए अविनाश पांडे, अजय माकन, रणदीप सुरजेवाला पर्यवेक्षक बनाकर भेजा। दूसरी तरफ सचिन पायलट को विश्वास भरा आश्वासन दिया जाता रहा। सचिन पायलट रविवार देर शाम को अपना वक्तव्य जारी करने की जल्दबाजी कर बैठे। उन्होंने अशोक गहलोत की सरकार को अल्पमत में बता दिया। लेकिन सोमवार को आए नतीजे ने जहां उन्हें विचलित और दु:खी करके रख दिया, वहीं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बाजी जीत चुके थे।