कांग्रेस-सपा का उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व गठबंधन हो गया है। अखिलेश और राहुल साझा प्रचार अभियान भी कर आए लेकिन अब इसे दिमाग नहीं दिल का गठबंधन साबित करने की कोशिश चल रही है। टीम राहुल चाहती है कि उत्तर प्रदेश में कम से कम चार साझा जनसभा मुलायम और सोनिया गांधी की हों।
दोनों के मुंह से अखिलेश के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश को आगे बढ़ाने की बात हो। बताते हैं टीम अखिलेश ने भरोसा दिया है कि समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा। सोनिया और मुलायम की साझा जनसभा होगी। मुलायम के साथ उत्तर प्रदेश में साझा प्रचार अभियान को आगे बढ़ाने में कांग्रेस अध्यक्ष को कोई परेशानी नहीं है।
पार्टी के प्रचार अभियान की रुपरेखा तैयार करने में जुटे प्रशांत किशोर भी चाहते हैं कि मुलायम और सोनिया साथ आएं। कांग्रेसी रणनीतिकारों को भी ऐसे पल का बेसब्री से इंतजार है। राहुल गांधी की टीम के एक अहम सदस्य का कहना है कि रविवार को लखनऊ में हुए रोड-शो की सफलता काफी कुछ कह रही है। हमें उम्मीद है आने वाले समय में सबकुछ अनुकूल ही रहेगा।
कहां है दिक्कत
मुलायम सिंह यादव, सोनिया गांधी के साथ साझा प्रचार अभियान के लिए अभी तैयार नहीं हो रहे हैं। यह बात उनके गले के नीचे नहीं उतर पा रही है। नेताजी(मुलायम) को लग रहा है कि जिस पार्टी की नीतियों का विरोध करते हुए उन्होंने समाजवादी पार्टी खड़ी की, आखिर कैसे उसके साथ उत्तर प्रदेश में मंच साझा कर लें।
उन्हें यह गठबंधन भी बिल्कुल रास नहीं आ रहा है। 2008 में परमाणु करार के मुद्दे पर यूपीए सरकार को विश्वास मत के लिए लोकसभा में समर्थन देने को भी वह अपनी सबसे बड़ी भूल बता चुके हैं।
उन्हीं की पार्टी के एक राज्यसभा सांसद और खुद को मुलायमवादी कहने वाले सूत्र के अनुसार कांग्रेस का साथ मुलायम के डीएनए में ही नहीं है, लेकिन वह पुत्र प्रेम के आगे मजबूर हैं।
सोनिया -मुलायम का साथ
राहुल और सोनिया गांधी
गठबंधन की आत्मीयता और सहजता के लिए जरूरी है। यह संदेश साझा जनसभा से आसानी से पूरे प्रदेश में फैलेगा। रणनीतिकारों का मानना है कि इससे जहां पार्टी और गठबंधन की एकजुटता सामने आएगी, वहीं भितरघातियों और बगावत करने वालों का असर कम हो जाएगा।
मुलायम को उत्तर प्रदेश में मौलाना मुलायम भी कहा जाता रहा है। इसके अलावा वह तमाम पिछड़े और अन्य पिछड़ा वर्ग में तालमेल बनाने के माहिर माने जाते हैं।
ऐसे में मुलायम के गठबंधन को स्वीकारने का संदेश देने के बाद जहां वोटों के बिखराव की संभावना कम हो जाएगी, वहीं कांग्रेस-सपा गठबंधन को इसका गुणात्मक लाभ मिलना तय है।