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चिंता: विकास मॉडल नहीं बदला तो ढह जाएगा हिमालय, वैज्ञानिकों ने दी अर्ली वार्निंग सिस्टम का जाल बिछाने की सलाह

Thu, 11 Sep 2025 05:02 AM IST
शिव शुक्ला अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड और हिमाचल का लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र भूस्खलन जोन में आता है। इसकी औसत भार वहन क्षमता प्रति हेक्टेयर 60 से 80 टन है। यानी चौड़ी सड़कों, बहुमंजिला होटलों, सुरंगों और बड़े बांध जैसे भारी निर्माण इस प्राकृतिक संतुलन को तोड़ देते हैं।
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हिमालय - फोटो : freepic
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विस्तार
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उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे हिमालयी राज्य इस समय आपदा की मार झेल रहे हैं। हर बार सरकारें इसे केवल मौसम की मार या जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताकर बच निकलना चाहती हैं, लेकिन विशेषज्ञ इसकी असली वजह अनियोजित और बेतरतीब विकास मॉडल को मानती है, जिसे समय रहते नहीं बदला गया तो ढहते हिमालय को बचा पाना मुश्किल होगा।

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भारतीय मौसम विज्ञान सोसायटी के अध्यक्ष एवं भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक आनंद शर्मा कहते हैं, एक दशक में पूर्वानुमान और मॉनिटरिंग की क्षमता में जबरदस्त सुधार हुआ है, लेकिन जब तक चेतावनियों पर समय रहते स्थानीय प्रशासन और समाज प्रतिक्रिया नहीं करेगा, तब तक केवल मौसम को दोषी ठहराना व्यर्थ है। असल विफलता विकास और योजना प्रक्रिया में है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में वेदर स्टेशन, अर्ली वार्निंग सिस्टम और ऑल-वेदर कम्युनिकेशन नेटवर्क का मजबूत जाल बिछाना होगा ताकि आपदा आने पर जानमाल का बचाव किया जा सकें। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन स्टडीज के वरिष्ठ भू-वैज्ञानिक डॉ. राकेश गौतम भी मानते हैं कि नदियों के किनारे अतिक्रमण, पहाड़ की स्थिरता जांच के बिना कंस्ट्रक्शन आपदा को न्योता देने जैसा है।

नदियों की जमीन पर बन रही इमारतेें तबाही का कारण
विशेषज्ञों का कहना है कि जब विकास प्रकृति के अनुरूप किया जाता है तो आपदाओं की मार काफी कम हो जाती है। जापान में समुद्र के किनारे लगाए गए सघन हरित पट्टे सुनामी और चक्रवात की पहली मार को रोकते हैं। वहीं, भारत में नदियों की जमीन पर अतिक्रमण कर इमारतें बनाई जा रही हैं, सड़कें सीधे जलधाराओं में धंसाई जा रही हैं और पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन महज औपचारिकता बन गया है। यही असंतुलित और अव्यवस्थित विकास हिमालयी क्षेत्रों को बार-बार तबाही की ओर धकेल रहा है।
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 पहाड़ों के भार सहन क्षमता की अनदेखी से बिगड़ रहा संतुलन
एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड और हिमाचल का लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र भूस्खलन जोन में आता है। इसकी औसत भार वहन क्षमता प्रति हेक्टेयर 60 से 80 टन है। यानी चौड़ी सड़कों, बहुमंजिला होटलों, सुरंगों और बड़े बांध जैसे भारी निर्माण इस प्राकृतिक संतुलन को तोड़ देते हैं।

असुरक्षित विकास परियोजनाएं
उत्तराखंड में अकेले चारधाम ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट के लिए 700 किलोमीटर से अधिक सड़क काटी गई, जिसका हजारों टन मलबा नदियों में डाल दिया गया। राज्य में 98 बड़ी और मध्यम बांध परियोजनाएं प्रस्तावित या निर्माणाधीन हैं, जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि इतनी नाजुक घाटियों में 20 से अधिक बड़े बांध पर्यावरणीय रूप से असुरक्षित हैं।

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