भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने दवा संवेदनशील फेफड़ों की टीबी के इलाज को तेज और अधिक प्रभावी बनाने के लिए देशभर में एक बड़ा क्लिनिकल ट्रायल शुरू करने की तैयारी की है। इस मल्टी-सेंट्रिक ट्रायल के लिए आईसीएमआर ने देश के 14 मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों को चुना है। ट्रायल में रिफैम्पिसिन की हाई डोज आधारित 4 और 6 महीने की नई इलाज रेजिमेन की तुलना की जाएगी, जिनमें लेवोफ्लाक्सासिन के उपयोग का भी मूल्यांकन किया जाएगा।
आईसीएमआर के अनुसार यह अध्ययन भारत के टीबी प्रबंधन में संभावित रूप से क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। हाई डोज रेजिमेन सुरक्षित और ज्यादा प्रभावी साबित होती है तो टीबी के इलाज की अवधि कम की जा सकती है और दवा पालन में सुधार होगा। दस्तावेज के मुताबिक चयनित संस्थानों को 10 दिनों के अंदर अपनी भागीदारी की औपचारिक पुष्टि करने के साथ दो महीने में सभी आवश्यक दस्तावेज जमा कराने होंगे। परिषद ने साफ किया है कि अंतिम स्वीकृति और फंड जारी होने से पहले कोई भी संस्थान खर्च या गतिविधि शुरू नहीं करेगा।
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इस महीने से प्रशिक्षण और प्रोटोकॉल ओरिएंटेशन शुरू करने की तैयारी
विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी अब भी भारत का सबसे बड़ा संक्रामक रोग है। इलाज का वर्तमान 6 महीने का कोर्स दवा छोड़ने, साइड इफेक्ट्स और निगरानी में कठिनाइयों के कारण कई बार अधूरा रह जाता है। यही कारण है कि दवा प्रतिरोधी टीबी के मामले बढ़ते जाते हैं। आईसीएमआर का यह नया अध्ययन इस चक्र को तोड़ने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
इन संस्थानों का चयन
चयनित संस्थानों में एनआईटीआरडी दिल्ली, केजीएमयू लखनऊ, जेजे अस्पताल मुंबई, एम्स नागपुर, एम्स गुवाहाटी, शिलांग, ओस्मानिया मेडिकल कॉलेज हैदराबाद और एम्स भुवनेश्वर सहित कई प्रमुख केंद्र शामिल हैं। विविध भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों वाले इन केंद्रों को शामिल करने से अध्ययन के निष्कर्ष अधिक प्रतिनिधिक माने जाएंगे।
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