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तैयारी: केंद्र के निर्देश पर आईसीएमआर ने बनाई योजना, अभी तक अमेरिका और यूरोप के मानकों पर हो रहा इलाज

Mon, 03 Nov 2025 07:41 AM IST
शुभम कुमार परीक्षित निर्भय

सार

भारत में बच्चों की मेडिकल रिपोर्ट अब विदेशी मानकों पर नहीं, बल्कि देश के अपने औसत पर तैयार होंगी। ICMR देश का पहला बच्चों और किशोरों के लिए मेडिकल रेफरेंस डाटाबेस बना रहा है। अलग-अलग हिस्सों से रक्त, हार्मोन और अन्य पैरामीटर्स का डेटा इकट्ठा कर भारतीय बच्चों के लिए सटीक मानक तय किए जाएंगे। इससे रिपोर्ट की गलत व्याख्या और दवा खुराक में त्रुटि कम होगी।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भारत में अब बच्चों की लैब रिपोर्ट विदेशी मानकों के आधार पर नहीं, बल्कि भारतीय औसत पर तैयार की जाएंगी। केंद्र सरकार के निर्देश पर नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) बच्चों और किशोरों के लिए देश का पहला मेडिकल रेफरेंस डाटाबेस तैयार करने जा रहा है। इसके तहत देश के अलग-अलग हिस्सों से रक्त, जैव रसायन, हार्मोन और अन्य मेडिकल पैरामीटर्स के मानक तय किए जाएंगे। अभी तक भारत की प्रयोगशालाओं में जो रेफरेंस इंटरवल्स यानी संदर्भ इस्तेमाल किए जा रहे हैं वे ज्यादातर अमेरिका या यूरोप की जनसंख्या पर आधारित हैं। अगर आसान शब्दों में कहें तो भारत में चिकित्सा जांच विदेशी मानकों पर आधारित होती है।

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यह स्थिति खासकर बच्चों के मामले में गंभीर है क्योंकि उम्र, लिंग, खानपान और भौगोलिक परिस्थितियों के अंतर के कारण भारतीय बच्चों की बायोलॉजिकल वैल्यू पश्चिमी देशों से काफी अलग होती हैं। इसी वजह से कई बार बच्चों की रिपोर्ट सामान्य या असामान्य की गलत व्याख्या हो जाती है जिससे इलाज और दवा की खुराक प्रभावित होती है। इसलिए अब सरकार ने बच्चों और किशोरों को लेकर स्वयं के मानक तय करने का फैसला लिया है।

आईसीएमआर ने देश के बाकी शोध संस्थानों से इस पहल में सहयोग देने के लिए आवेदन भी मांगे है जिसमें बताया है कि ब्लड प्रोफाइल, लिवर फंक्शन टेस्ट, किडनी फंक्शन, थायरॉयड, लिपिड, इलेक्ट्रोलाइट, हार्मोन स्तर, विटामिन्स और मिनरल्स से जुड़े करीब 100 से अधिक जैव-रासायनिक व हेमेटोलॉजिकल मानक निर्धारित किए जाएगें। इन नमूनों का विश्लेषण इलेक्ट्रिकल इम्पीडेंस, फ्लो साइटोमेट्री, केमिकल एनालिसिस जैसी आधुनिक तकनीकों से किया जाएगा।
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हर चौथा नमूना ग्रामीण क्षेत्र से जरूरी
आईसीएमआर ने भारत को छह अलग अलग जोन उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम, मध्य और उत्तर-पूर्व में बांटा है ताकि आसानी से देशभर की प्रयोगशालाओं से डाटा एकत्रित किया जा सके। प्रत्येक जोन में नवजात शिशु से लेकर 18 वर्ष तक के किशोरों तक के नमूने लिए जाएंगे। इन नमूनों के आधार पर आयु और लिंग के अनुसार अलग-अलग रेफरेंस वैल्यू तय की जाएगी, ताकि आने वाले समय में भारत का अपना बच्चों का स्वास्थ्य मानक तैयार हो सके। कम से कम 25% नमूने ग्रामीण क्षेत्रों से लिए जाएंगे, ताकि यह डाटा पूरे देश की वास्तविक जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करे।

माता पिता देंगे लिखित सहमति, तभी बच्चे होंगे शामिल
आईसीएमआर ने जानकारी दी है कि भारतीय मानकों को तैयार करने के लिए एक अध्ययन किया जाएगा जो एक बहुकेन्द्रीय आबादी आधारित क्रॉस-सेक्शनल अध्ययन होगा। देशभर की एनएबीएल मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाएं इसमें शामिल होंगी जो रक्त व अन्य जैविक नमूनों का विश्लेषण करेंगी। सभी केंद्र को स्वस्थ बच्चों की पहचान करने के साथ साथ नमूनों का संग्रह और परिवहन के अलावा विश्लेषण और डाटा सत्यापन एकीकृत मानक प्रोटोकॉल (एसओपी) के तहत करनी होगा। आईसीएमआर ने साफ तौर पर कहा है कि हर प्रतिभागी की भागीदारी माता-पिता की लिखित सहमति और बच्चों की रजामंदी के बाद ही की जाएगी।

यह भारत के बच्चों के लिए ऐतिहासिक कदम
आईसीएमआर की डिस्कवरी रिसर्च डिवीजन से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक ने कहा कि अब तक भारत के बच्चे विदेशी औसत पर आधारित टेस्ट रिपोर्ट से इलाज पाते थे। यह पहल उस स्थिति को बदल देगी। हमारा लक्ष्य है कि भारत का हर बच्चा अपनी जनसंख्या के हिसाब से जांच और इलाज पाए। यह पहल भारतीय चिकित्सा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव ला सकती है। पहली बार भारत के बच्चों की सेहत को आंकने का पैमाना विदेशी नहीं बल्कि भारतीय होगा। उन्होंने कहा कि यह न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से मील का पत्थर साबित होगा बल्कि आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य नीति निर्धारण में भी आधार बनेगा।

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